गौरैया

गौरैया को देखकर
कौन चिड़िया मात्र को याद करता है?
गौरैया की चंचलता देखकर
बेटी की चंचल आँखें याद आती हैं,
पत्नी को देखता हूँ रसोई में हलकान
गौरैया याद आती है,
एनीमिया से पीड़ित एक परिचित लड़की
कंधे पर हाथ रखती है
एक गौरैया भर का भार
महसूस करता हूँ अपने कंधे पर,
गौरैया को कौन याद करता है चिड़िया की तरह!

जाल

उस जाल का बिम्ब
जो छान ले तमाम दुःख
जीवन से
और
सुख की मछलियाँ
मानस में तैरती रहें,
हम मामूली लोगों की
कल्पना में
रह-रहकर आता है।

गिनती

किसी भी चीज़ को उँगलियों पर गिनता हूँ
उदासी के दिनों को
ख़ुशी के दिनों को
ट्रेन के डिब्बों को
पहाड़ को
नदी को
थाली में रोटी को
तुम्हारे घर लौटने के दिनों को
जब उँगलियों के घेरे से बाहर निकल जाती है गणना
तो अनगिनत चीज़ें गिनती से बाहर रह जाती हैं
इस गणतन्त्र में।

कविता

कविता में भाषा को
लामबन्द कर
लड़ी जा सकती हैं लड़ाइयाँ
पहाड़ पर
मैदान में
दर्रा में
खेत में
चौराहे पर
पराजय के बारे में
न सोचते हुए।

रेलगाड़ी

दूर प्रदेश से
घर लौटता आदमी
रेलगाड़ी में लिखता है कविता,
घर से दूर जाता आदमी
रेलगाड़ी में पढ़ता है गद्य,
घर जाता हुआ आदमी
कितना तरल होता है,
घर से दूर जाता आदमी
हो जाता है विश्लेषणात्मक।

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रोहित ठाकुर
जन्म तिथि - 06/12/1978; शैक्षणिक योग्यता - परा-स्नातक राजनीति विज्ञान; निवास: पटना, बिहार | विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं बया, हंस, वागर्थ, पूर्वग्रह ,दोआबा , तद्भव, कथादेश, आजकल, मधुमती आदि में कविताएँ प्रकाशित | विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों - हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, अमर उजाला आदि में कविताएँ प्रकाशित | 50 से अधिक ब्लॉगों पर कविताएँ प्रकाशित | कविताओं का मराठी और पंजाबी भाषा में अनुवाद प्रकाशित।

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