आलम्बन, आधार यही है, यही सहारा है
कविता मेरी जीवन शैली, जीवन धारा है।

यही ओढ़ता, यही बिछाता
यही पहनता हूँ
सबका है वह दर्द जिसे मैं
अपना कहता हूँ
देखो ना तन लहर-लहर
मन पारा-पारा है।

कविता मेरी जीवन शैली, जीवन धारा है।

पानी-सा मैं बहता बढ़ता
रुकता-मुड़ता हूँ
उत्सव-सा अपनों से
जुड़ता और बिछुड़ता हूँ
उत्सव ही है राग हमारा
प्राण हमारा है।

कविता मेरी जीवन शैली, जीवन धारा है।

नाता मेरा धूप-छाँह से
घाटी-टीलों से
मिलने ही निकला हूँ
घर से पर्वत-झीलों से
बिना नाव-पतवार धार में
दूर किनारा है।

आलम्बन, आधार यही है, यही सहारा है
कविता मेरी जीवन शैली, जीवन धारा है।

कैलाश गौतम की कविता 'गाँव गया था, गाँव से भागा'

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कैलाश गौतम
हिन्दी और भोजपुरी बोली के रचनाकार कैलाश गौतम का जन्म चन्दौली जनपद के डिग्धी गांव में 8 जनवरी, 1944 को हुआ। शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और प्रयाग विश्वविद्यालय में हुई। लगभग 37 वर्षों तक इलाहाबाद आकाशवाणी में विभागीय कलाकार के रूप में सेवा करते रहे। अब सेवा मुक्त हो चुके हैं।