बुद्ध पूर्णिमा की रात
चीथड़े और लोथड़ों के बीच
पूरे चाँद-सी गोल रोटियों की फुलकारियाँ
उन मज़दूरों के हाथों का हुनर पेश कर रही थीं
जो अब रेलवे ट्रैक पर बिखरे पड़े थे

ये रोटियाँ ही तो थीं उनका सपना
जिसे पूरा करने वे घर से दूर आए थे

अब ये रोटियाँ ही उनकी कुल जमा-पूँजी थीं और पैरों के छाले
जिन्हें सम्भाल वे अपने घर की ओर चले थे पैदल ही

किसी बस्ती या गली में उनको घुसने नहीं दिया
सड़क से पुलिस ने खदेड़ दिया
रेलवे ट्रैक ही था उनके लिए अब सीधा रास्ता

वे मीलों चले, थके, रुके
कुछ खाया और कुछ बचाया

उन्हें यह तो मालूम था कि रेलें बन्द हैं
और यह भी कि जो चली हैं
उन तक पहुँचना मरने से कम नहीं
सो वहीं सो गए

लेकिन उन्हें यह मालूम नहीं था कि
मालदारों के माल से लदी मालगाड़ियाँ
महामारियों में भी नहीं रुकती
एक दनदनाती आयी और उन्हें कुचलकर चली गई

बची तो सिर्फ़ वे चाँद-सी गोल रोटियाँ और बिखरे हुए चप्पल, सिर-धड़, हाथ-पैर और कपड़ों की गिनती
तथा बची मीडिया की ग़लीज़ सुर्ख़ियाँ और शासन की जुगुप्सित सम्वेदनाएँ!

— मंगतराम शास्त्री, 8-5-2020

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