Poems: Sumit Madan

ठोकरें

मैं ठोकरें खाता हुआ
बढ़ रहा था
कि कुछ हाथ
मुझे सहारा देने आगे आए।
मैं सम्भल गया।
उसके बाद,
ना मैंने ठोकरें खायीं,
ना ही मैं आगे बढ़ पाया।
मैं सिर्फ़ हाथों की
प्रतीक्षा में रहा।

अस्पताल

मैं अस्पताल गया था,
सूने घर के अलावा
उससे डरावनी जगह
शायद कोई नहीं है।

मैंने काउण्टर पर खड़े
उस भाई की
हड़बड़ाहट देखी है
जिसकी परीक्षाएँ चल रही हैं
और जिसे अभी
दवाई लेने भी जाना है।

मैंने जनरल वार्ड में
अपने पति के सिरहाने बैठी
उस औरत की आँखें भी देखी हैं
जो रोना चाहतीं है पर
अपने बच्चों का हौसला बढ़ाने के लिए
मुस्कुरा रही हैं।

मैंने उन रिश्तेदारों को भी देखा
जिनमें कुछ झूठी
तो कुछ सच्ची हमदर्दी लिए
उन तीन जन के परिवार पर
एक अहसान लाद गए।

अस्पताल में शोर बहुत होता है,
पर उस समय मुझे
सिर्फ़ अपनी तेज़ हुई धड़कन ही
सुनायी दे रही थी
जब उस माँ की चीख़ से
सारा अस्पताल गूँज उठा
जिसके बेटे ने अभी-अभी
आईसीयू में दम तोड़ा है।

मेरे लिए उस चीख़ से भयावह
कुछ और नहीं था।

सूने घर के अलावा
अस्पताल से डरावनी जगह
शायद कोई नहीं।

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