मैं अलग तरह का प्रेम चाहती हूँ

‘Main Alag Tarah Ka Prem Chahti Hoon’, a poem by Nidhi Gupta

नहीं बनना राधा मुझे
रुक्मिणी की भूमिका में भी सहमति नहीं है मेरी
मीरा बनकर कलंक भी नहीं चाहती
न ही सीता की तरह अग्निपरीक्षा
उर्मिला का वियोग
यशोधरा का विलाप
कौशल्या का त्याग

कुछ भी नहीं
मैं अलग तरह का प्रेम चाहती हूँ

करके प्रेम कहलाना प्रेमिका
प्रेम न होते हुए भी बनना सर्वग्राही अर्धांगिनी
खो बैठना सब कुछ, रहे न कोई अवशेष श्लेष मात्र भी
आत्मपरीक्षण का कोई औचित्य नहीं
कर्तव्य के पथ पर लगन-मण्डप को छोड़ जाना
ज्ञान का मार्ग और भी हो सकता है
मत मानो विधि का लिखा
लिखो ख़ुद का जोखा

हाय! ये कैसा प्रेम
जो केवल माँगना जनता हो
सब मूल्यों के समक्ष हमें उपेक्षिता समझता हो…

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