दीवार पर टंगी घड़ी
कहती— “उठो अब वक़्त आ गया।”

कोने में खड़ी छड़ी
कहती— “चलो अब, बहुत दूर जाना है।”

पैताने रखे जूते पाँव छूते—
“पहन लो हमें, रास्ता ऊबड़-खाबड़ है।”

सन्नाटा कहता— “घबराओ मत
मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

यादें कहतीं— “भूल जाओ हमें अब,
हमारा कोई ठिकाना नहीं।”

सिरहाने खड़ा अन्धेरे का लबादा
कहता— “ओढ़ लो मुझे
बाहर बर्फ़ पड़ रही
और हमें मुँह-अन्धेरे ही निकल जाना है…”

एक बीमार
बिस्तर से उठे बिना ही
घर से बाहर चला जाता।

बाक़ी बची दुनिया
उसके बाद का आयोजन है।

Book by Kunwar Narayan:

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कुँवर नारायण
कुँवर नारायण का जन्म १९ सितंबर १९२७ को हुआ। नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुँवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक (१९५९) के प्रमुख कवियों में रहे हैं। कुँवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के जरिये वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है।

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