‘Prem Niyati’, a poem by Niki Pushkar

किसी का प्रेम स्वीकार करना
किसी से प्रेम हो जाना
दो पृथक घटनाएँ हैं

कई दफ़े सुरक्षित भविष्य की प्रत्याभूति पर
प्रेम स्वीकारे गये
कई दफ़े विकल्पों के अभाव में
तो कभी,
यूँ ही मनोविनोद के लिए…
और जब भी इस तरह
प्रेम स्वीकारे गये,
भविष्य निःसन्देह सुरक्षित हुआ,
एकांकी पथ के साथी मिले,
कुछ समय मनोविनोद भी हुआ
किन्तु,
प्रेयस की
अन्तस स्वीकृति का अभाव रहा,
प्रेमी के साथ रहते
प्रेम का अनुसंधान निरन्तर रहा

जब प्रेम होकर
परिणय की नियति तक पहुँचा
एक समय पश्चात वह भी
उदासीनता का शिकार हुआ

प्रेयस प्रेम,
दम्पति प्रेम में परिवर्तित होते ही
प्रेमिकाएँ उपेक्षित महसूस करने लगीं,
प्रेमियों को प्रेमिकाओं की विशेषताएँ
आम सी लगने लगीं,
ढूँढकर भी पुराने प्रेयस मिलते न थे…
प्रेम की खोज यहाँ भी
निरन्तर जारी रही…
आरम्भ पृथक था प्रेम का
किन्तु,
नियति एक सी ही रही…।

निकी पुष्कर
Pushkarniki [email protected] काव्य-संग्रह -पुष्कर विशे'श'