राहुल सांकृत्यायन की किताब ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ से उद्धरण | Quotes from Ghumakkad Shastra, a book by Rahul Sankrityayan

चयन: पुनीत कुसुम

“वैसे तो गीता को बहुत नई बोतल में पुरानी शराब और दर्शन तथा उच्‍च धर्माचार के नाम पर लोगों को पथभ्रष्‍ट करने में ही सफलता मिली है, किंतु उसमें कोई-कोई बात सच्‍ची भी निकल आती है।”

 

“प्रथम श्रेणी के एक घुमक्कड़ को पैदा करने के लिए हज़ार द्वितीय श्रेणी के घुमक्कड़ों की आवश्‍यकता होगी।”

 

“बाहरी दुनिया से अधिक बाधाएँ आदमी के दिल में होती हैं।”

 

“घुमक्कड़ होने का यह अर्थ नहीं कि अपनी जन्‍म भूमि उसका प्रेम न हो।”

 

“शत्रु आदमी को बाँध नहीं सकता और न उदासीन व्यक्ति ही। सबसे कड़ा बंधन होता है स्नेह का, और स्नेह में यदि निरीहता सम्मिलित हो जाती है, तो वह और भी मज़बूत हो जाता है।”

 

“घुमक्कड़ी का अंकुर क्या डंडे से पीटकर नष्‍ट किया जा सकता है?”

 

“स्वर्ग-नरक जिस सुमेध-पर्वत के शिखर और पाताल में थे, आज के भूगोल ने उस भूगोल को ही झूठा साबित कर दिया है।”

 

“अँधेरे में छलाँग मारने से ज़रा भी भय नहीं खाना चाहिए।”

 

“नए पंख वाले बच्‍चे छोटी ही उड़ान करते हैं।”

 

“घुमक्कड़ को समाज पर भार बनकर नहीं रहना है। उसे आशा होगी कि समाज और विश्व के हरेक देश के लोग उसकी सहायता करेंगे, लेकिन उसका काम आराम से भिखमंगी करना नहीं है। उसे दुनिया से जितना लेना है, उससे सौ गुना अधिक देना है। जो इस दृष्टि से घर छोड़ता है, वही सफल और यशस्वी घुमक्कड़ बन सकता है।”

 

“बढ़िया-से-बढ़िया होटलों में ठहरने, बढ़िया-से-बढ़िया विमानों पर सैर करने वालों को घुमक्कड़ कहना इस महान शब्द के प्रति भारी अन्याय करना है।”

 

“यूरोप में हरेक व्यक्ति कुछ-न-कुछ नाचना जानता है।”

 

“वह प्रेम कैसा जो आदमी की विवेक-बुद्धि पर परदा डाल दे, सारी प्रतिभा को बेकार कर दे?”

 

“बाहरवालों के लिए चाहे वह कष्‍ट, भय और रूखेपन का जीवन मालूम होता हो, लेकिन घुमक्कड़ी जीवन घुमक्कड़ के लिए मिसरी का लड्डू है, जिसे जहाँ से खाया जाए, वहीं से मीठा लगता है।”

 

“जहाँ स्त्रियों को अधिक दासता की बेड़ी में जकड़ा नहीं गया, वहाँ की स्त्रियाँ साहस-यात्राओं से बाज़ नहीं आतीं।”

 

“नारी भी आज के समाज में उसी तरह रोम-रोम में परतंत्रता की उन सूइयों से बिंधी है, जिन्‍हें पुरुषों के हाथों ने गाड़ा है। किसी को आशा नहीं रखनी चाहिए कि पुरुष उन सूइयों को निकाल देगा।”

 

“नारी का ब्‍याह, अगर उसके ऊपरी आवरण को हटा दिया जाए तो इसके सिवा कुछ नहीं है कि नारी ने अपनी रोटी-कपड़े और वस्‍त्राभूषण के लिए अपना शरीर सारे जीवन के निमित्त किसी पुरुष को बेच दिया है।”

 

“यह अच्छा तर्क है, स्‍त्री को पहले हाथ-पैर बाँधकर पटक दो और फिर उसके बाद कहो कि इतिहास में तो साहसी यात्रिणियों का कहीं नाम नहीं आता। यदि इतिहास में अभी तक साहस यात्रिणियों का उल्‍लेख नहीं आता, यदि पिछला इतिहास उनके पक्ष में नहीं है, तो आज की तरुणी अपना नया इतिहास बनाएगी, अपने लिए नया रास्‍ता निकालेगी।”

 

“घुमक्कड़, जब तक कोई विशेष प्रयोजन न हो, किसी का जन्‍मस्‍थान नहीं पूछते और जात-पाँत पूछना तो घटिया श्रेणी के घुमक्कड़ों में ही देखा जाता है।”

 

“स्‍त्री-पुरुष का एक-दूसरे के प्रति आकर्षण और उसका परिणाम मानव की सनातन समस्‍या है।”

 

“वस्‍तुत: हमारा झगड़ा प्रेम से नहीं है, प्रेम रहे, किंतु पंख भी साथ में रहें।”

 

“घुमक्कड़ का अंतिम जीवन पेंशन लेने का नहीं है। समय के साथ-साथ आदमी का ज्ञान और अनुभव बढ़ता जाता है, और उसको अपने ज्ञान और अनुभव से दुनिया को लाभ पहुँचाना है, तभी वह अपनी ज़िम्मेदारी और हृदय के भार को हल्‍का कर सकता है।”

 

“मृत्‍यु को नाहक ही भय की वस्‍तु समझा जाता है। यदि जीवन में कोई अप्रिय वस्‍तु है तो वह वस्‍तुतः मृत्‍यु नहीं है, मृत्‍यु का भय है। मृत्‍यु के हो जाने के बाद तो वह कोई विचारने की बात ही नहीं।”

 

“इतिहास का फ़ैसला आँखों के सामने नहीं होता। वह उस समय होता है जबकि कोई सिफ़ारिश नहीं पहुँचायी जा सकती।”

 

“निर्माण का विचार सबसे सुन्दर है। बिना अपने कलेवर को आगे बढ़ाए, अपने जीवित समय में विश्‍व को कुछ देना, फिर सदा के लिए शून्‍य में विलीन हो जाना, यह कल्‍पना कितनों के लिए अनाकर्षक मालूम होगी। किन्तु कितने ही ऐसे भी विचारशील हो सकते हैं जो अपना काम करने के बाद बालू के पदचिह्न की भाँति विलीन हो जाने के विचार से भयभीत नहीं, बल्कि प्रसन्‍न होंगे।”

 

“मनुष्‍य के मन में जितनी कल्पनाएँ उठती हैं, यदि बाहरी दुनिया से कोई सम्बन्ध न हो, तो वह बिलकुल नहीं उठ सकतीं, वैसे ही जैसे कि फ़िल्म-भरा कैमरा शटर खोले बिना कुछ नहीं कर सकता।”

 

“उच्‍च श्रेणी के घुमक्कड़ के लिए लेखनी का धनी होना बहुत ज़रूरी है।”

 

“बँधी हुई लेखनी को खोलने का काम यदि घुमक्कड़ी नहीं कर सकती, तो कोई दूसरा नहीं कर सकता।”

 

“जो इतिहास केवल राजा-रानियों तक ही अपने को सीमित रखता है, वह एकांगी होता है, उससे हमें उस समय के सारे समाज का परिचय नहीं मिलता।”

 

“यह करोड़पति प्रकाशक लोगों को प्रकाश में नहीं लाना चाहते; वह चाहते हैं कि वह और अँधेरे में रहें, इसीलिए वह लोगों को हर तरह से बेवक़ूफ़ रखने की कोशिश करते हैं।”

 

“वस्‍तुतः घुमक्कड़ी को साधारण बात नहीं समझनी चाहिए, यह सत्‍य की खोज के लिए, कला के निर्माण के लिए, सद्भावनाओं के प्रसार के लिए महान दिग्विजय है!”

 

“हर एक आदमी अपने साथ एक वातावरण लेकर घूमता है, जिसके पास आने वाले अवश्य उससे प्रभावित होते हैं।”

 

“गर्व में आकर दूसरे देश को हीन समझने की प्रवृत्ति हमारे घुमक्कड़ की कभी नहीं होगी, यह हमारी आशा है और यही हमारी परम्परा भी है।”

 

“आने वाले घुमक्कड़ों के रास्‍ते को साफ़ रखना, यह भी हर एक घुमक्कड़ का कर्तव्‍य है।”

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राहुल सांकृत्यायन
राहुल सांकृत्यायन जिन्हें महापंडित की उपाधि दी जाती है हिन्दी के एक प्रमुख साहित्यकार थे। वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद् थे और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उन्होंने यात्रा वृतांत/यात्रा साहित्य तथा विश्व-दर्शन के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान किए। वह हिंदी यात्रासहित्य के पितामह कहे जाते हैं। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिन्दी साहित्य में युगान्तरकारी माना जाता है, जिसके लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया था। इसके अलावा उन्होंने मध्य-एशिया तथा कॉकेशस भ्रमण पर भी यात्रा वृतांत लिखे जो साहित्यिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं।

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