माँ
रोती रही
सारी रात

दिन जैसी
ही दीप्त,
शरद की,
पूनम की,
बाँवरी रात

सहलाती रही
माँ का सिर,
मुलायम-सी,
ममतामयी रात

बेसुध हो
सोते रहे
तात

रोता रहा
समूचा गगन,
कुँवारा चाँद,
तकिया, कम्बल,
मनहूस खाट

और,
माँ…!

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कुशाग्र अद्वैत
कुशाग्र अद्वैत बनारस में रहते हैं, इक्कीस बरस के हैं, कविताएँ लिखते हैं। इतिहास, मिथक और सिनेेमा में विशेष रुचि रखते हैं।अभी बनारस हिन्दू विश्विद्यालय से राजनीति विज्ञान में ऑनर्स कर रहे हैं।

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