रंगत

‘Rangat’, a poem by Niki Pushkar

गहरे साँवले रंग की लड़की
वयस्क होने तक
डूब चुकी होती है,
रंग के गहरेपन में

बचपन से रंगभेदी टिप्पणियों को
सहते-झेलते
ख़ूब जान चुकी होती है कि
सारे रंग नहीं बने उसके लिए
और सारे रंगों के लिए वह…

गुणी-सुशील होने के बावज़ूद
अक्सर नकार दी जाती है वह,
साँवले रंग के कारण।

उसका ये गहरापन
गहरे तक सकुचाया रखता है उसे
पति के सम्मुख….
उसे हमेशा ही चुनने पड़ते हैं रंग,
बदन की रंगत के मुताबिक़
जिनसे छुप सके
उसके शरीर का गहरापन
हाँ,
इस गहरे दबाव को
झेलते हुए
कभी-कभी इस गीत को सुनकर
मुस्करा लेती है वह,
“कहीं एक नाज़ुक-सी भोली-सी लड़की
बहुत ख़ूबसूरत मगर साँवली सी…”