सब्र आता है जुदाई में, न ख़्वाब आता है
रात आती है इलाही कि अज़ाब आता है

बे-क़रारी दिल-ए-बेताब की ख़ाली तो नहीं
या वो ख़ुद आते हैं या ख़त का जवाब आता है

मुँह में वाइज़ के भी भर आता है पानी अक्सर
जब कभी तज़्किरा-ए-जाम-ए-शराब आता है

किस क़यामत की ये आमद है ख़ुदा ख़ैर करे
फ़ित्ना-ए-हश्र भी हम-राह-ए-रिकाब आता है

रिंद-ए-मशरब कोई ‘बेख़ुद’ सा न होगा वल्लाह
पी के मस्जिद ही में ये ख़ाना-ख़राब आता है