उत्कण्ठाओं के दिन नियत थे
प्रेम के नहीं थे

चेष्टाओं की परिमिति नियत थी
इच्छाओं की नहीं थी

परिभाषाएँ संकुचन हैं
जो न कभी प्रेम बांध पायीं
न देह

स्मृतियाँ एक दोहराव हैं,
जो बीत गए की पुनरावृत्ति का
दम्भ तो भरती हैं लेकिन
अपनी सार्थकता में अपूर्ण
शब्दभेदी बाण की तरह
अन्तस में चुभती रहती हैं

विरह बिम्बों से भरा दर्पण है
जो एक और बिम्ब के
उर्धवाकार समष्टि का भार
सहन करने में असहाय
हर एक विलग क्षण में टूटता रहता है

दर्पण का टूटना
प्रतीक्षाओं के उत्तरार्ध की निराशा है

उससे छिटककर गिरा एक बिम्ब
कृष्ण के पाँव में धँसा हुआ
बहेलिए का तीर है

प्रेम मनुष्य के लिए सब कुछ बचा लेता है
जो प्रतीक्षाओं को नहीं प्राप्त होता

सब जाते हैं उद्विग्नता से प्रेम की तरफ़
और लौटते हैं अपनी
स्मृतियों की खोह में बरामद होते हुए

एकान्त के समभारिक क्षणों में कहीं कोई स्थायित्व नहीं है

वेदनाएँ अभ्यस्त एकालाप हैं
और एकान्त—
अनीश्वरवाद की पीड़ा!

मनीष कुमार यादव की कविता 'कजरी के गीत मिथ्या हैं'

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