समीक्ष्य कृति: दलदल (कहानी संग्रह) (अंतिका प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद)

टिप्पणी: सुषमा मुनीन्द्र

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सुपरिचित रचनाकार सुशांत सुप्रिय का सद्यः प्रकाशित कथा संग्रह ‘दलदल’ ऐसे समय में आया है जब निरन्तर कहा जा रहा है कि कहानी से कहानीपन और क़िस्सागोई शैली ग़ायब होती जा रही है। संग्रह में बीस कहानियाँ हैं जिनमें ऐसी ज़बरदस्त क़िस्सागोई है कि लगता है शीर्षक कहानी ‘दलदल’ का क़िस्सागो बूढ़ा, दक्षता से कहानी सुना रहा है और हम कहानी पढ़ नहीं रहे हैं वरन साँस बाँधकर सुन रहे हैं कि आगे क्या होने वाला है। पूरे संग्रह में ऐसा एक क्रम, एक सिलसिला-सा बनता चला गया है कि हम संग्रह को पढ़ते-पढ़ते पूरा पढ़ जाते हैं। कभी उत्सुकता, कभी जिज्ञासा, कभी भय, कभी सिहरन, कभी आक्रोश, कभी खीझ, कभी कुटिलता, कभी कृपा से गुज़र रहे पात्र इतने जीवन्त हैं कि सहज ही अपने भाव पाठकों को दे जाते हैं। ‘दलदल’ कहानी के विकलांग सुब्रोतो का करुण तरीक़े से दलदल में डूबते जाना सिहरन से भरता है तो ‘बलिदान’ की बाढ़ग्रस्त भैरवी नदी में नाव पर सवार क्षमता से अधिक परिजनों द्वारा डगमगाती नाव का भार कम करने के लिए, किसका जीवित रहना अधिक ज़रूरी है, किसका कम, इस आधार पर एक-एक कर नदी में कूदकर आत्म-उत्सर्ग करना स्तब्ध करता है। “काले चोर प्रोन्नति पाएँ, ईमानदार निलम्बित हों”—ऐसे अराजक, अनैतिक माहौल में ख़ुद को मिसफ़िट पाते ‘मिसफ़िट’ के केन्द्रीय पात्र का आत्महत्या का मानस बनाकर रेलवे ट्रैक पर लेटना भय से भरता है तो ‘पाँचवी दिशा’ के पिता का हॉट एयर बैलून में बैठकर उड़ना, गुब्बारे का अंतरिक्ष में ठहर जाना जिज्ञासा से भरता है। ‘दुमदार जी की दुम’ के दुमदार जी की रातों-रात ‘दुम निकल आयी है’ जैसे भ्रामक प्रचार को अलौकिक और ईश्वरीय चमत्कार मानकर लोगों का उनके प्रति श्रद्धा से भर जाना उत्सुकता जगाता है तो ‘बयान’ के निष्ठुर भाई का “यातना-शिविर जैसे पति-गृह से किसी तरह छूट भागी मिनी को ज़बरदस्ती घसीटकर फिर वहीं (पति-गृह) पहुँचा देना।” आक्रोश से तिलमिला देता है। वस्तुतः सुशांत सुप्रिय की पारखी-विवेकी दृष्टि अपने समय और समाज की प्रत्येक स्थिति-परिस्थिति-मनःस्थिति पर ऐसे दायित्व बोध के साथ पड़ती है कि संग्रह की पंक्तियाँ तत्कालीन व्यवहार-आचरण का सच्चा बयान बन गई हैं—

“कैसा समय है यह, जब भेड़ियों ने हथिया ली हैं सारी मशालें, और हम निहत्थे खड़े हैं।”

(कहानी ‘दो दूना पाँच’)

“बेटा, पहले-पहल जो भी लीक से हटकर कुछ करना चाहता है, लोग उसे सनकी और पागल कहते हैं।”

(कहानी ‘पाँचवीं दिशा’)

“मैं नहीं चाहता था मिनी आकाश जितना फैले, समुद्र भर गहराए, फेनिल पहाड़ी-सी बह निकले… मेरे ज़हन में लड़कियों के लिए एक निश्चित जीवन-शैली थी।”

(कहानी ‘बयान’)

“लोग आपको ठगने और मूर्ख बनाने में माहिर होते हैं। मुँह से कुछ कह रहे होते हैं जबकि उनकी आँखें कुछ और ही बयाँ कर रही होती हैं।”

(कहानी ‘एक गुम सी चोट’)

ये कुछ ऐसी वास्तविकताएँ हैं जिनसे संत्रस्त हो चुका आम आदमी सवाल करने लगा है— “नेक मनुष्यों का उत्पादन हो सके क्या कोई ऐसा कारख़ाना नहीं लगाया जा सकता?” लेकिन संग्रह की कहानियों में जो सकारात्मक भाव हैं, वे सवाल का उत्तर दें न दें, आम आदमी को आश्वासन ज़रूर देते हैं कि “मुश्किलों के बावजूद यह दुनिया रहने की एक ख़ूबसूरत जगह है।” (कहानी ‘पिता के नाम’)

2

संग्रह की मूर्ति, पाँचवीं दिशा, चश्मा, भूतनाथ आदि कहानियाँ आभासी संसार का पता देती हैं। ये कहानियाँ यदि लेखक की कल्पना हैं तो अद्भुत हैं, सत्य हैं तब भी अद्भुत हैं। ‘मूर्ति’ का समृद्ध उद्योगपति जतन नाहटा आदिवासियों से वह मूर्ति, जिसे वे अपना ग्राम्य देवता मानते हैं, बलपूर्वक अपने साथ ले जाता है। मूर्ति उसे मानसिक रूप से इतना अस्थिर-असन्तुलित कर देती है कि वह पागलपन के चरम पर पहुँचकर अंततः मर जाता है। ‘पाँचवीं दिशा’ के पिता हॉट एयर बैलून में बैठकर उड़ान भरते हैं। ग़ुब्बारा अंतरिक्ष में स्थापित हो जाता है। वे वहाँ से सैटेलाइट की तरह गाँव वालों को मौसम परिवर्तन की सूचना भेजा करते हैं। ‘चश्मा’ कहानी के परिवार के पास चार-पाँच पीढ़ियों से एक विलक्षण चश्मा है जिसे पहनकर भविष्य में होने वाली घटना-दुर्घटना के दृश्य देखे जा सकते हैं। दृश्य देखने में वही सफल हो सकता है जिसका अन्तर्मन साफ़ हो। ‘भूतनाथ’ का भूत मानव देह धारण कर लोगों की सहायता करता है। वैसे ‘भूतनाथ’ और ‘दो दूना पाँच’ कहानियाँ फ़िल्मी ड्रामा की तरह लगती हैं। सुकून यह है कि जब हत्या, बलात्कार, दुर्घटना, वन्य प्राणियों का शिकार कर, ग़लत तरीक़े से शस्त्र रख धन-कुबेर और उनकी सन्तानें पकड़ी नहीं जातीं या पुलिस और अदालत से छूट जाती हैं, वहाँ ‘दो दूना पाँच’ के कुकर्मी प्रकाश को फाँसी की सज़ा दी जाती है। कहानियों में ज़मीनी सच्चाई है इसीलिए झाड़ू, इश्क़ वो आतिश है ग़ालिब जैसी प्रेम-कहानियाॅं भी प्रेम-राग का अतिरंजित या अतिनाटकीय समर्थन करते हुए मुक्त गगन में नहीं उड़तीं बल्कि इस वास्तविकता को पुष्ट करती हैं कि प्रेम के अलावा भी कई-कई रिश्ते होते और बनते हैं और यदि विवेक से काम लिया जाए तो हर रिश्ते को उसका प्राप्य मिल सकता है—

“जगहें अपने आप में कुछ नहीं होतीं। जगहों की अहमियत उन लोगों से होती है जो एक निश्चित काल-अवधि में आपके जीवन में उपस्थित होते हैं।”

(पृष्ठ 73)

लेकिन कुछ स्थितियाँ ऐसा नतीजा बन जाती हैं कि इंसान शारीरिक यातना से किसी प्रकार छूट जाता है लेकिन मानसिक यातना से जीवन भर नहीं छूट पाता। बिना किसी पुख़्ता सबूत के, सन्देह के आधार पर जाति विशेष के लोगों को अपराधी साबित करना सचमुच दुःखद है। ‘मेरा जुर्म क्या है?’ के मुस्लिम पात्र के घर की सन्देह के आधार पर तलाशी ली जाती है, उसे जेल भेजा जाता है। बरसों बाद वह निर्दोष साबित होकर घर लौटता है लेकिन ये यातना भरे बरस उसका जो कुछ छीन लेते हैं, उसकी भरपाई नामुमकिन है। ‘कहानी कभी नहीं मरती’ के छब्बे पाजी 1984 जून में चलाए गए आपरेशन ब्लू-स्टार के फ़ौजी अभियान की चपेट में आते हैं। झूठी निशानदेही पर ‘ए’ कैटेगरी का ख़तरनाक आतंकवादी बताकर उन्हें जेल भेजा जाता है। वे भी बरसों बाद निर्दोष साबित होते हैं। कहानियों में इतनी विविधता है कि समकालीन समाज और जीवन की सभ्यता-पद्धति, आचरण-व्यवहार, यम-नियम, चिन्तन-चुनौती, मार्मिकता-मंथन, समस्या-समाधान, साम्प्रदायिकता-नौकरशाही, क़ानून-व्यवस्था, मीडिया, भूकम्प, बाढ़, अकाल, बाँध, डूबते गाँव, कटते जंगल, किलकता बचपन, गुल्ली-डंडा, कबड्डी जैसे देसी खेल, कार्टून चैनल, वीडियो गेम्स, मोबाइल, लैप-टाप जैसे गैजेट्स… बहुत कुछ दर्ज हैं।

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सुशांत की कहानियाँ आकार में लम्बी नहीं, अपेक्षाकृत छोटी हैं तथापि सार्वभौमिक सत्य को सामने लाने में सक्षम हैं। भाषा आकर्षक और बोधगम्य है। आह्लाद और विनोद का पुट कहानियों को रोचक बना देता है। पात्रों के अनुरूप छोटे-छोटे, अनुकूल सम्वाद हैं जो अत्यधिक उचित लगते हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है क़िस्सागोई का आनंद देती ये कहानियाँ दिमाग़ पर हथौड़े की तरह वार करती हैं, तथा दिल पर असर छोड़ते हुए सकारात्मक सोच अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं। अच्छे कहानी संग्रह के लिए सुशांत सुप्रिय को बधाई और शुभकामनाएँ।

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