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राहुल बोयल की कविताएँ
1
एक देवी की प्रतिमा है - निर्वसन
पहन लिया है मास्क मुख पर
जबकि बग़ल में पड़ा है बुरखा
देवताओं ने अवसान की घड़ी में भी
जारी रखी...
पृथ्वी सोच रही है
ये जो चारों तरफ़ की हवा है
भर गई है उन पैरों की धूल से
जो इस पृथ्वी पर सबसे अकेले हो गए हैं
वे असंख्य लोग हैं
जो...
निंदिया लागी
'Nindiya Lagi', a story by Bhagwati Prasad Vajpeyi
कॉलेज से लौटते समय मैं अकसर अपने नये बंगले को देखता हुआ घर आया करता। उन दिनों...
मैं जानता हूँ
मैं उस किसान को जानता हूँ
जिसके खेत में इतनी कपास होती है
कि रेशे से जिसके, फांसी का फंदा बनता है।
मैं उस लुहार को जानता...
घर लौटते मज़दूर
बड़े शहर से गांव लौटते मज़दूर
कभी पूरा नहीं लौटते
शहर में छोड़ कर आते हैं वो
पुराने बरतन, फटी चटाई, स्टोव
इसके साथ ही छूटे रह जाते...
वह तोड़ती पत्थर
'Wah Todti Patthar', a poem by Suryakant Tripathi Nirala
वह तोड़ती पत्थर!
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर।
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले...
मज़दूरों का गीत
मेहनत से ये माना चूर हैं हम
आराम से कोसों दूर हैं हम
पर लड़ने पर मजबूर हैं हम
मज़दूर हैं हम, मज़दूर हैं हम
गो आफ़त ओ...
मज़दूर की मज़दूरी
आपने चार आने पैसे मज़दूर के हाथ में रखकर कहा - "यह लो दिन भर की अपनी मज़दूरी।"
वाह क्या दिल्लगी है!





