Tag: Labour

Lockdown Migration, Labour

राहुल बोयल की कविताएँ

1 एक देवी की प्रतिमा है - निर्वसन पहन लिया है मास्क मुख पर जबकि बग़ल में पड़ा है बुरखा देवताओं ने अवसान की घड़ी में भी जारी रखी...
Shankaranand

पृथ्वी सोच रही है

ये जो चारों तरफ़ की हवा है भर गई है उन पैरों की धूल से जो इस पृथ्वी पर सबसे अकेले हो गए हैं वे असंख्य लोग हैं जो...
Labour, Woman

निंदिया लागी

'Nindiya Lagi', a story by Bhagwati Prasad Vajpeyi कॉलेज से लौटते समय मैं अकसर अपने नये बंगले को देखता हुआ घर आया करता। उन दिनों...

मैं जानता हूँ

मैं उस किसान को जानता हूँ जिसके खेत में इतनी कपास होती है कि रेशे से जिसके, फांसी का फंदा बनता है। मैं उस लुहार को जानता...
Labour, Woman

घर लौटते मज़दूर

बड़े शहर से गांव लौटते मज़दूर कभी पूरा नहीं लौटते शहर में छोड़ कर आते हैं वो पुराने बरतन, फटी चटाई, स्टोव इसके साथ ही छूटे रह जाते...
Suryakant Tripathi Nirala

वह तोड़ती पत्थर

'Wah Todti Patthar', a poem by Suryakant Tripathi Nirala वह तोड़ती पत्थर! देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर- वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले...
Majaz Lakhnavi

मज़दूरों का गीत

मेहनत से ये माना चूर हैं हम आराम से कोसों दूर हैं हम पर लड़ने पर मजबूर हैं हम मज़दूर हैं हम, मज़दूर हैं हम गो आफ़त ओ...
sardar puran singh

मज़दूर की मज़दूरी

आपने चार आने पैसे मज़दूर के हाथ में रखकर कहा - "यह लो दिन भर की अपनी मज़दूरी।" वाह क्या दिल्लगी है!
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