Tag: Labour

Shankaranand

पैदल चलते लोग

तमाम दृश्यों को हटाता, घसीटता और ठोकर मारता हुआ चारों तरफ़ एक ही दृश्य है बस एक ही आवाज़ जो पैरों के उठने और गिरने की हुआ करती...
Lockdown Migration, Labours

बस यही है पाप

पटरियों पर रोटियाँ हैं रोटियों पर ख़ून है, तप रही हैं हड्डियाँ, अगला महीना जून है। सभ्यता के जिस शिखर से चू रहा है रक्त, आँखें आज हैं आरक्त, अगणित, स्वप्न के संघर्ष...
Drought, Femine, Bengal

मरेंगे साथ, जियेंगे साथ

पगडण्डी, पतली-दुबली लजीली। उस पर हमारे पैरों का बोझ। हरियाली में जाकर वह लजवंती खो गई। छेवड़िया ऊँघ रहा था। हवा सनसना रही थी।...
Tribe, Village, Adivasi, Labour, Tribal, Poor

ऊँचाइयाँ, विज्ञान की भावना, भूख

ऊँचाइयाँ गुरुत्वाकर्षण पदार्थो के गिरने का अद्वितीय नियम है। हर चीज़ फिर गिरती है, मज़दूर की तरह, नीचे की तरफ़। पटरियों पर चौड़े हाईवे पर नदियों के भीतर गटर के अन्दर कारख़ानों में खदानों में पाखानों में, पर उसके लिए एक पूर्वशर्त है 'ऊँचाइयाँ' इमारतों...
Shankaranand

रोटी की तस्वीर

यूँ तो रोटी किसी भी रूप में हो सुन्दर लगती है उसके पीछे की आग चूल्हे की गन्ध और बनाने वाले की छाप दिखायी नहीं देती लेकिन होती हमेशा रोटी के...
Two Faces, Closed Eyes, Abstract

बीस-बीस की बुद्ध पूर्णिमा

बुद्ध पूर्णिमा की रात चीथड़े और लोथड़ों के बीच पूरे चाँद-सी गोल रोटियों की फुलकारियाँ उन मज़दूरों के हाथों का हुनर पेश कर रही थीं जो अब रेलवे...
Lockdown Migration, Labours

महज़ मज़दूर ही तो थे

शहर लॉकडाउन, सरकारें ट्वीटर पर मीडिया अपने आक़ाओं के यशोगान में सड़क पर पुलिस अपनी नौकरियाँ बचाने में उनके पास रोज़गार नहीं बचे थे उन्हें भूख लगती थी गर्भवती...
Labor, Man carrying bucket of mud

पत्थर

मेरी क़ब्र का पत्थर मेरे पेट पर रख देना तब भरा दिखेगा पेट मेरा और कोई हँसकर नहीं कह पाएगा कि 'लाश का पेट ख़ाली है!' लोग बहुत ग़ौर से देखते है लाशों...
Madan Daga

क्षणिकाएँ : मदन डागा

कुर्सी कुर्सी पहले कुर्सी थी फ़क़त कुर्सी, फिर सीढ़ी बनी और अब हो गई है पालना, ज़रा होश से सम्भालना! भूख से नहीं मरते हमारे देश में आधे से अधिक लोग ग़रीबी की रेखा के...
Lockdown Migration, Labours

प्रवासी मज़दूर

मैंने कब माँगा था तुमसे आकाश का बादल धरती का कोना सागर की लहर हवा का झोंका सिंहासन की धूल पुरखों की राख या अपने बच्चे के लिए दूध यह सब वर्जित...
Parmanand Raman

परमानन्द रमन की कविताएँ

आपदा प्रबन्धन कहीं किसी कोने में जीवन यात्रा के भी हो एक आपातकालीन खिड़की आपदाओं के शिकार कुछ टूटे/हारे रिश्ते पहुँच नहीं पाते अपने अन्तिम पड़ाव तक। आवेदन नहीं था कोई कॉलम किसी भी...
Kumar Mangalam

कुमार मंगलम की कविताएँ

रात के आठ बजे मैं सो रहा था उस वक़्त बहुत बेहिसाब आदमी हूँ सोने-जगने-खाने-पीने का कोई नियत वक़्त नहीं है ना ही वक़्त के अनुशासन में रहा हूँ कभी मैं सो...
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