Tag: Raghuvir Sahay

Raghuvir Sahay

सड़क पर रपट

देखो सड़क पार करता है पतला दुबला बोदा आदमी आती हुई टरक का इसको डर नहीं या कि जल्दी चलने का इसमें दम नहीं रहा आँख उठा...
Raghuvir Sahay

पैदल आदमी

जब सीमा के इस पार पड़ी थीं लाशें तब सीमा के उस पार पड़ी थीं लाशें सिकुड़ी ठिठरी नंगी अनजानी लाशें वे उधर से इधर आ करके...
Raghuvir Sahay

अंधी पिस्तौल

सुरक्षा अधिकारी सेनाधिपति के घूर कर देखते हैं मेरा चेहरा बहुत दिनों से उन्होंने नहीं देखा है मेरा चेहरा धीरे-धीरे कम होती गयी है मेरी और सेनाधिपति की बातचीत इसलिए...
Raghuvir Sahay

लुभाना

बड़ी किसी को लुभा रही थी चालिस के ऊपर की औरत घड़ी घड़ी खिलखिला रही थी चालिस के ऊपर की औरत खड़ी अगर होती वह थककर चालिस के ऊपर...
Raghuvir Sahay

मुझे कुछ और करना था

मुझे कुछ और करना था पर मैं कुछ और कर रहा हूँ मुझे और कुछ करना था इस अधूरे संसार में मुझे कुछ पूरा करना था मकान...
Raghuvir Sahay

किताब पढ़कर रोना

रोया हूँ मैं भी किताब पढ़कर के पर अब याद नहीं कौन-सी शायद वह कोई वृत्तांत था पात्र जिसके अनेक बनते थे चारों तरफ से मंडराते हुए आते...
Raghuvir Sahay

हँसो हँसो जल्दी हँसो

हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही है हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी और तुम मारे जाओगे ऐसे हँसो कि बहुत...
Raghuvir Sahay

दुनिया

हिलती हुई मुण्डेरें हैं और चटखे हुए हैं पुल बररे हुए दरवाज़े हैं और धँसते हुए चबूतरे दुनिया एक चुरमुरायी हुई-सी चीज़ हो गयी है दुनिया एक पपड़ियायी...
Bird, Window

एक जीता-जागता व्यक्ति

एक चिड़िया रास्ते में तारकोल की कीचड़ में फँसी हुई है और छूटने का भरसक प्रयास कर रही है.. क्या आप उसे उस कीचड़ में से छुड़ाएँगे या उसके खुद छूट जाने की प्रतीक्षा करेंगे?
Raghuvir Sahay

दे दिया जाता हूँ

मुझे नहीं मालूम था कि मेरी युवावस्था के दिनों में भी यानी आज भी दृश्यालेख इतना सुन्दर हो सकता है : शाम को सूरज डूबेगा दूर मकानों की क़तार सुनहरी...
Raghuvir Sahay

भय

'Bhay', a poem by Raghuvir Sahay कितनी सचमुच है यह स्त्री कि एक बार इसके सारे बदन का एक व्यक्ति बन गया है उसके बाल अब घने...
Raghuvir Sahay

रामदास

"चौड़ी सड़क गली पतली थी दिन का समय घनी बदली थी रामदास उस दिन उदास था अंत समय आ गया पास था उसे बता यह दिया गया था उसकी हत्या होगी.." देश के शासन तंत्र की कमजोरी और भ्रष्टाचार को उजागर करती यह कविता, हिन्दी की सबसे सशक्त कविताओं में से एक है.. राजनीती और प्रशासन पर जैसा रघुवीर सहाय ने लिखा, अन्यत्र इतनी आसानी से नहीं मिलता.. ज़रूर पढ़िए!
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