Tag: Raghuvir Sahay
सड़क पर रपट
देखो सड़क पार करता है पतला दुबला बोदा आदमी
आती हुई टरक का इसको डर नहीं
या कि जल्दी चलने का इसमें दम नहीं रहा
आँख उठा...
पैदल आदमी
जब सीमा के इस पार पड़ी थीं लाशें
तब सीमा के उस पार पड़ी थीं लाशें
सिकुड़ी ठिठरी नंगी अनजानी लाशें
वे उधर से इधर आ करके...
अंधी पिस्तौल
सुरक्षा अधिकारी सेनाधिपति के
घूर कर देखते हैं मेरा चेहरा
बहुत दिनों से उन्होंने नहीं देखा है मेरा चेहरा
धीरे-धीरे कम होती गयी है मेरी और सेनाधिपति की
बातचीत
इसलिए...
लुभाना
बड़ी किसी को लुभा रही थी
चालिस के ऊपर की औरत
घड़ी घड़ी खिलखिला रही थी
चालिस के ऊपर की औरत
खड़ी अगर होती वह थककर
चालिस के ऊपर...
मुझे कुछ और करना था
मुझे कुछ और करना था
पर मैं कुछ और कर रहा हूँ
मुझे और कुछ करना था इस अधूरे संसार में मुझे
कुछ पूरा करना था मकान...
किताब पढ़कर रोना
रोया हूँ मैं भी किताब पढ़कर के
पर अब याद नहीं कौन-सी
शायद वह कोई वृत्तांत था
पात्र जिसके अनेक
बनते थे चारों तरफ से मंडराते हुए आते...
हँसो हँसो जल्दी हँसो
हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही है
हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट
पकड़ ली जाएगी और तुम मारे जाओगे
ऐसे हँसो कि बहुत...
दुनिया
हिलती हुई मुण्डेरें हैं और चटखे हुए हैं पुल
बररे हुए दरवाज़े हैं और धँसते हुए चबूतरे
दुनिया एक चुरमुरायी हुई-सी चीज़ हो गयी है
दुनिया एक पपड़ियायी...
एक जीता-जागता व्यक्ति
एक चिड़िया रास्ते में तारकोल की कीचड़ में फँसी हुई है और छूटने का भरसक प्रयास कर रही है.. क्या आप उसे उस कीचड़ में से छुड़ाएँगे या उसके खुद छूट जाने की प्रतीक्षा करेंगे?
दे दिया जाता हूँ
मुझे नहीं मालूम था कि मेरी युवावस्था के दिनों में भी
यानी आज भी
दृश्यालेख इतना सुन्दर हो सकता है :
शाम को सूरज डूबेगा
दूर मकानों की क़तार सुनहरी...
भय
'Bhay', a poem by Raghuvir Sahay
कितनी सचमुच है यह स्त्री
कि एक बार इसके सारे बदन का एक व्यक्ति बन गया है
उसके बाल अब घने...
रामदास
"चौड़ी सड़क गली पतली थी
दिन का समय घनी बदली थी
रामदास उस दिन उदास था
अंत समय आ गया पास था
उसे बता यह दिया गया था उसकी हत्या होगी.."
देश के शासन तंत्र की कमजोरी और भ्रष्टाचार को उजागर करती यह कविता, हिन्दी की सबसे सशक्त कविताओं में से एक है.. राजनीती और प्रशासन पर जैसा रघुवीर सहाय ने लिखा, अन्यत्र इतनी आसानी से नहीं मिलता.. ज़रूर पढ़िए!


