देखो सड़क पार करता है पतला दुबला बोदा आदमी
आती हुई टरक का इसको डर नहीं
या कि जल्दी चलने का इसमें दम नहीं रहा
आँख उठा देखता है वह डरेवर को
देखो मैं ऐसे ही चल पाता हूँ

मैंने इस तरह के आदमी इस बरस पिछले के मुकाबले बहुत
देखे जिनको खाने को पूरा नहीं मिला बरस भर
कैसे भी पहुँच जाते हैं दफ़्तर वक़्त से
घर लौट आते हैं देर सबेर घरवालों को कभी अस्पताल
में पड़े नहीं मिलते हैं

मैंने इस वर्ष देखे एक ख़ास किस्म के नौजवान रँगेचुँगे
चुस्त उठाकर अँगूठा रोकते हुए मोटर
सवारी का हक भाईचाराना माँगते
इस वर्ष कारें भी बढ़ीं नौजवान भी
इस वर्ष मैंने देखा बल्कि एक दिन देखा
एक दिन अस्पताल एक दिन स्कूल के सामने
खड़ा हुआ एक लँगड़ा बूढ़ा एक दिन नन्हा लड़का पार
जाने को एक एक घंटे इन्तज़ार में
कि कोई कारवाला गाड़ी धीमी करे

इस वर्ष मैंने और भी देखा
कुत्ते जगह जगह कुचले
वे ठिठक गये थे जहाँ थे बीच रस्ते पर
उनके न ताकत थी उनके न इच्छा थी कि दौड़कर बच जायें

यह रपट यहीं खत्म होती है चाहे एक मामूली बात और
जोड़ लें कि इस वर्ष मैंने और अधिक मोटर मालिक देखे नियम
तोड़ कर बायें हाथ से अगली गाड़ी से अगिया जाते हुए

उन लड़कों का यहाँ ज़िक्र तक नहीं किया गया
जो इन्हें देखकर खून का घूँट पीकर रह जाते हैं
क्योंकि उनमें से कोई दुर्घटना में शामिल नहीं हुआ।

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रघुवीर सहाय
रघुवीर सहाय (९ दिसम्बर १९२९ - ३० दिसम्बर १९९०) हिन्दी के साहित्यकार व पत्रकार थे। दूसरा सप्तक, सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो हँसो जल्दी हँसो (कविता संग्रह), रास्ता इधर से है (कहानी संग्रह), दिल्ली मेरा परदेश और लिखने का कारण (निबंध संग्रह) उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।