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फाहा
बढ़ती उम्र में बच्चों को अपने शरीर के बारे में बताने की फ़िक्र मंटो के यहाँ भी थी.. पढ़िए एक बेहद संवेदनशील कहानी 'फाहा'!
1919 की एक बात
"उन्होंने अपनी ज़र्क़-बर्क़ पिशवाज़ें नोच डालीं और अलिफ़ नंगी हो गईं और कहने लगीं... लो देख लो... हम थैले की बहनें हैं... उस शहीद की जिसके ख़ूबसूरत जिस्म को तुमने सिर्फ़ इसलिए अपनी गोलियों से छलनी-छलनी किया था कि उसमें वतन से मोहब्बत करने वाली रूह थी..."
आज जलियाँवाला बाग हत्याकांड को सौ वर्ष हो गए हैं! ऐसे निर्मम हत्याकांडों में मौत के सरकारी और वास्तविक आकड़ों के परे भी ऐसी यातनाएँ होती हैं जो केवल पीड़ित लोगों ने देखी हैं.. मंटो की यह कहानी उन्हीं यातनाओं की एक झलक पाठकों के सामने रखती है.. पढ़िए!
नया क़ानून
मंगू कोचवान को गोरों से सख्त नफ़रत है और इस नफ़रत को जीते हुए उसे इंतज़ार है पहली अप्रैल का, क्योंकि उसने अपनी ही कुछ सवारियों से सुना है कि पहली अप्रैल से नया क़ानून लागू होने वाला है और उसे उम्मीद है कि नया क़ानून आने के बाद उसे इन गोरों व इनके अत्याचारों से छुटकारा मिल जाएगा। पहली अप्रैल आती है, लेकिन छुटकारा?
जायज़ इस्तेमाल
दस राउंड चलाने और तीन आदमियों को ज़ख़्मी करने के बाद पठान भी आख़िर सुर्ख़रु हो ही गया।
एक अफ़रा तफ़री मची थी। लोग...
मोमबत्ती के आँसू
हर इंसान चाहता है कि जो संघर्ष अपने जीवन में उन्होंने किए हैं, उन संघर्षों से उनकी औलाद दूर रहे, लेकिन जब ऐसा होता संभव नज़र नहीं आता तो यह बोध कराने वाला क्षण उस इंसान के सबसे कमज़ोर क्षणों में से एक होता है.. चन्दू के जीवन का यही कमज़ोर क्षण मंटो की इस कहानी में मोमबत्ती का आंसू बनकर ढलता है! पढ़िए!
बादशाहत का ख़ात्मा
एक दिन वो बड़ा टेढ़ा सवाल कर बैठी, “मोहन तुम ने कभी किसी लड़की से मोहब्बत की है?”
मनमोहन ने जवाब दिया, “नहीं”
“क्यों?”
मोहन एक दम उदास हो गया, “इस क्यों का जवाब चंद लफ़्ज़ों में नहीं दे सकता। मुझे अपनी ज़िंदगी का सारा मलबा उठाना पड़ेगा... अगर कोई जवाब न मिले तो बड़ी कोफ़्त होगी।”
आर्टिस्ट लोग
एक दिन जमीला ने अपने शौहर को ये मुज़्दा सुनाया कि उसे एक अमीर घराने में मौसीक़ी सिखाने की टीयूशन मिल रही है। महमूद ने ये सुन कर उस से कहा, “नहीं टीयूशन वीयूशन बकवास है, हम लोग आर्टिस्ट हैं।”
उसकी बीवी ने बड़े प्यार के साथ कहा, “लेकिन मेरी जान गुज़ारा कैसे होगा?”
निगरानी में
सहम कर ब ने पूछा, "कोई और ख़बर..."
जवाब मिला, "ख़ास नहीं... नहर में तीन कुत्तियों की लाशें मिलीं।"
अ ने ब की ख़ातिर मिल्ट्री वालों से कहा, "मिल्ट्री कुछ इंतिज़ाम नहीं करती।"
जवाब मिल, "क्यूँ नहीं... सब काम उसी की निगरानी में होता है।"
पठानिस्तान
क्योंकि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान पर्याप्त नहीं थे...!
पेश-बंदी
नई रात, नई जगह, नई वारदात.. और कहानी? वही पुरानी!!
#Manto #Partition
तक़्सीम
"इस सन्दूक के माल में से मुझे कितना मिलेगा।”
सन्दूक पर पहली नज़र डालने वाले ने जवाब दिया, “एक चौथाई।”
“बहुत कम है।”
“कम बिल्कुल नहीं, ज़्यादा है.. इसलिए कि सबसे पहले मैंने ही इस पर हाथ डाला था।”
“ठीक है, लेकिन यहाँ तक इस कमर तोड़ बोझ को उठा के लाया कौन है?”
“आधे आधे पर राज़ी होते हो?”
“ठीक है… खोलो सन्दूक।”
तआवुन
विभाजन ऐसा दौर रहा है जिसमें हर तरह की लूट-खसूट हुई, इंसान ने ख़ुद को इंसान न कहलाए जाने के सारे कारण पैदा किए.. लेकिन साथ ही इस दौर में इंसानियत का वह चेहरा भी देखने को मिला जिसका अंदाज़ा शायद उन इंसानों को भी नहीं था जो उसका माध्यम बने! पढ़िए कहानी एक ऐसे आदमी की, जो एक घर की लूट के दौरान लोगों से यह अपील कर रहा है कि वे सब तआवुन से, सहयोग से काम लें.. और बिना तोड़-फोड़ इस घर को लूटें.. कौन था वह आदमी?



