तुम्हारे साथ मुझे बँधना है, वो बँधन चाहे जैसा हो

‘Tumhare Sath Mujhe Bandhna Hai’, Hindi Patr by Rupam Mishra

तुम आंशिक रूप से घुल गये हो मेरे व्यक्तित्व में! तुम्हारा श्रेष्ठ चरित्र हमेशा मेरे सामने खड़े होकर मेरी व्यवहारिकता को विस्तृत नहीं होने देता।

मैं किसी औपचारिकता में भी बड़ी सूक्ष्म दृष्टि से तुम्हारे व्यक्तित्व का अवलोकन करके अंजाने में ही अन्य व्यक्तित्व पर थोपने लगती हूँ।

जाने कैसे मानवीय गुण भूल जाती हूँ कि कुछ मानव दुर्बलताएँ ही मनुष्य को मनुष्य बनाए रखती हैं नहीं तो उसकी गिनती देवता में होने लगती है और वो कभी चाहकर भी सामान्य व्यक्ति नहीं बन पाता जबकि यह उस व्यक्ति के व्यक्ति होने पर अन्याय है।

जानती हूँ यह मेरे व्यक्तित्व का संकुचित स्तर हो गया है, कभी दुःख होता है कि तुम जाकर भी मेरे अंदर से नहीं गये… और मेरी आत्मीयता के विस्तार पर जाते-जाते लक्ष्मण रेखा खींचकर गये जिसे जब भी पार करने के लिए कदम उठाती हूँ तो हँसते हुए आकर ठीक आँखों में खड़े हो जाते हो! जा रहे थे तो तुम एकदम से क्यों नहीं गये! क्यों बचे रह गये हो मुझमें!

अन्याय की बात पर याद आया एक दिन तुमने कहा कि जानती हो जब तुम न्याय अन्याय के बात पर उत्तेजित हो जाती हो तो मुझे हँसी आती है क्योंकि न्याय अन्याय भी सम्बन्धों की नियति पर आश्रित हो गया है यहाँ तक कि सामान्य सद्भाव भी सम्बन्ध की ओर याचना से देखता है। तुम जानती हो उस दिन हमें साथ में देखकर यहाँ का माली पूछ रहा था मुझसे कि तुम कौन हो मेरी? बहन हो?

तुम्हारी ये बातें सुनकर मुझे ज़रा भी अचरज नहीं हुआ और न उत्तर जानने की जिज्ञासा! क्योंकि जानती हूँ तुम अपनी मौन मुस्कान से मेरे जाने कितने प्रश्नों को अनुत्तरित करते रहते हो! तो उसकी बात पर भी तुम बस मुस्कुराकर देखते रह गये होगें।

पर मैं आज तुम्हें बताती हूँ! मैं दुनिया का नहीं जानती! पर अपनी बात कहती हूँ! तुम अभी इसी वक़्त जिस भी सम्बन्ध में मुझे बाँधना चाहो मैं तैयार हूँ! वो संसार का चाहे जो सम्बन्ध हो! क्योंकि तुम्हारा श्रेष्ठ चरित्र मुझे संसार के सारे सम्बन्धों से ज़्यादा प्रिय है! तुम्हारे आचरण की श्रेष्ठता मेरे लिए संसार के सभी रिश्तों से श्रेष्ठतम है! तुम्हारे साथ मुझे बँधना है, वो बँधन चाहे जैसा हो।

और ये बात सिर्फ़ तुम्हारी नहीं! मैं संसार के सारे सात्विक और श्रेष्ठतम चरित्रों से जुड़े रहना चाहती हूँ। मुझे इससे आत्मिक सुख मिलता है, जहाँ सत्य और मानवता को सर्वोपरि रखा जाता है मेरी आत्मा वहाँ पोषित होती है… उसके लिए मैं सम्बन्धों की पराधीन नहीं हूँ… मेरा बस चले तो जहाँ से सत्य के अनुगामी गुज़रें, वो पथ अपने आँचल से बहारूँ! मैं अगर उनके किसी भी अर्थ में आऊँ तो वो मेरा सौभाग्य होगा!

तुम इसे मेरी अपात्रता का आग्रही हठ कहकर हँस भी सकते हो! और मेरे लिए ये भी सुखद होगा कि मैं पल भर के लिए ही सही तुम्हारी हँसी का कारण बनी।

मैं जानती हूँ अभी मेरे पास ठोस जीवन दर्शन नहीं है, बस सत्य पर आस्था और श्रद्धा है और उसी की उँगली पकड़े जीवन भर चलना मेरे आत्मिक आनन्द की प्रवित्ति है।

(पत्र जो कभी लिखे नहीं गये)

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