‘Virginia Woolf Se Sab Darte Hain’, Hasya Vyangya by Sharad Joshi

कुछ दिन हुए हमारे शहर में वह मशहूर पिक्चर लगी, जिसका नाम है ‘हू इज़ अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वुल्फ’। सभी शहरों में पिछले बरसों में चल चुकने के बाद यह हमारे शहर में आई थी और उसका सिर्फ एक शो हुआ था। काफी था। अच्छे चित्र जिस प्रकार बेआबरू होकर यहाँ से निकलते हैं उसे देखते हुए इस फिल्म का सिर्फ एक शो लगाना ही उचित था। भीड़ थी। मैनेजर को भीड़ देख शायद लगा हो कि दो शो भी चल जाते पर दूसरा शो खाली रहता। हमारे शहर के सारे स्नॉब्सू, बुद्धिवादी और एलिज़ाबेथ टेलर के प्रेमी यदि एकत्र किए जाएँ तो एक हॉल से अधिक नहीं होते।

हुआ यों कि एक पहले दोपहर एकाएक सचिवालय में यह अफवाह फैल गई कि कतिपय प्रमुख सचिवों के परिवार ‘वर्जीनिया वुल्फ’ देखने जा रहे हैं। किस्सा यों शुरू हुआ कि एक छोटा अधिकारी जब सचिव के कमरे में गया और बोला, “सर, अगर आपको टाइम हो तो कल बँगले पर आ जाऊँ सारी फाइलें लेकर, हालाँकि सण्डे है, फिर आप जैसा मुनासिब समझें।”

इस पर बड़ा अफसर कमर पर हाथ रखे कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला, “कल तो भई हम पिक्चर देखने जा रहे हैं। वो कौन-सी लगी है, ‘हू इज़ अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वुल्फ’।”

यह एक ऐसा क्षण था जब मुस्कराया जा सकता था। छोटा अफसर हल्के से मुस्कराया। पर ठीक उसी क्षण बड़े अफसर के चेहरे पर गम्भीरता आ गई। वह सोचने लगा कि उसे क्या पोज़ लेना चाहिए। प्रशासन के जिस ऊँचे दायित्व को वह कंधे पर रखे था उसे ध्यान में रख दो रास्ते अपनाए जा सकते हैं। बताए कि आखिर वह भी सामान्य मनुष्य है, उसे भी यदा-कदा मनोरंजन लगता है। दूसरा यह कि वह तो इस सिनेमा वगैरा देखने के छुकरपन से ऊपर उठ चुका है पर क्या करें मजबूरी है, जाना पड़ रहा है। वह बोला, “बेबी बहुत पीछे पड़ रही है, डैडी चलो, अच्छी पिक्चर है।”

फिर उसने कंधे उचकाए, “ठीक है भाई, चलेंगे।” कुछ रुककर उसने छोटे अफसर से आँख मिलाकर कहा, “वाकई, अच्छी पिक्चर है!”

छोटा अफसर, जिसके चेहरे पर वह मुस्कराहट अभी भी अटकी हुई थी, एकाएक घबरा गया। फिर सिर झुकाकर बोला, “सुना तो मैंने भी है सर! कोई बता रहा था कि अच्छी पिक्चर है!”

“हूँ, देअर इज़ दैट फेमस, क्या नाम है उसका, एलिज़ाबेथ टेलर और दूसरा एक्टर भी मशहूर है, आह… क्या… मैं नाम भूल रहा हूँ?” बड़े अफसर ने प्रश्नवाचक आँखों से छोटे अफसर को देखा।

छोटे अफसर ने सिर झुकाकर बालों पर हाथ फेरा जैसे वह याद कर रहा हो। फिर कुछ शर्मिन्दा हो बोला, “मैं मालूम करके बताऊँगा, सर!”

बड़े अफसर ने बिना कुछ कहे पास की रेक से एक स्थानीय अंग्रेज़ी अखबार उठाया और उसके आखिरी पृष्ठ पर नज़र डाल विज्ञापन खोज लिया और बोला, “रिचर्ड बरटन, रिचर्ड बरटन, यस!”

“यस सर रिचार्ड बरटन!” छोटे अफसर ने उसी शर्मिन्दगी से कहा जैसे एक्टर का नाम न जानना मूलत: उसका कसूर हो।

बड़े अफसर के कमरे में आकर छोटे अफसर ने सबसे पहले गुप्ता को फोन लगाया, “क्या कर रहे हो?”

“मक्खियाँ मार रहे हैं।”

“कल वो पिक्चर देखने चल रहे हो- हू इज़ अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वुल्फ?”

“हू इज़ अफ्रेड ऑफ क्या?”

“वर्जीनिया वुल्फ!”

“क्या नाम रखते हैं साले! अपन नहीं चल रहे, भैया। कल मिसेज़ का करवाचौथ का व्रत है तो घर पर ही ड्यूटी देनी पड़ेगी।”

“अरे चल यार, सब जा रहे हैं।”

“कौन जा रहा है?”

“अपना साहब जा रहा है विथ फेमिली!”

“अच्छा!” अब गुप्ता नरम पड़ा, “क्या वाकई अच्छी फिल्म है?”

जवाब में गुप्ता को एलिज़ाबेथ टेलर और रिचार्ड बरटन के नाम सुनने को मिले। वह तैयार हो गया।

वह सचिवालय की किसी रेस में पीछे नहीं रहना चाहता था। उसने त्रिवेदी को बताया। त्रिवेदी ने शर्मा को। शर्मा के कमरे में दासगुप्ता बैठा था जिससे जौहरी और आगाशे को पता चला। धीरे-धीरे सचिवालय के सारे कोनों से एक ही बात सुनाई देने लगी, “हू इज़ अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वुल्फ, हू इज़ अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वुल्फ। बड़ा साहब जा रहा है विथ फेमिली। विथ फेमिली। साहब जा रहा है। हू इज़ अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वुल्फ। एलिज़ाबेथ टेलर। एलिज़ाबेथ टेलर। सब जा रहे हैं। हू इज़ अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वुल्फ। विथ फेमिली।”

सचिवालय से यह खबर छनकर हेड ऑफ दि डिपार्टमेन्ट्स के दफ्तरों में पहुँच गई कि सचिवालय में सब लोग कल दिखाए जानेवाले किसी अंग्रेज़ी सिनेमा की बात कर रहे हैं। डिप्टी और असिस्टेण्ट डायरेक्टरों तक खबर पहुँची। राजधानी में सरकारी दौरे पर आए ज़िले के अफसरों ने भी तय किया कि सभी बड़े लोग जिस काम में शुमार हैं हमें भी हो जाना चाहिए। शाम को बँगलों के ड्राइंगरूमों में इसपर चर्चा होती रही। सुना, अच्छी पिक्चर है। रात के दस बजे तक शहर के पुलिस अफसरों को पता चल गया कि कल आला अफसरान वह अंग्रेज़ी फिल्म देखने जा रहे हैं जो फलाँ टाकीज़ में लगी है। उन्होंने गालियाँ बकीं, “साली रविवार की सुबह भी वर्दी कसनी पड़ेगी।”

तय हुआ कि इन्तज़ाम लगेगा। चार कान्स्टेबलों, एक सब-इंस्पेक्टर और दो अनुभवी ट्रेफिक मैनों को सुबह नौ बजे सिनेमा पर हाज़िर रहने के ऑर्डर मिले। उन्होंने एड़ी ठोंककर जवाब दिए, “जी हजूर!”

अफसर लोग आए। एक के बाद एक कारें धीरे-धीरे रेंगती हुई सिनेमा के अहाते में घुसने लगीं। कुछ स्कूटरों पर थे और कुछ पराई कारों में घुस लिए थे। होम सेक्रेटरी की गाड़ी आती देख पुलिस का सब-इंस्पेक्टर, जो सिनेमा मैनेजर के कमरे में घुस फोकट का कोकाकोला पी रहा था, अधूरी बोतल छोड़ बाहर आ गया। अंग्रेज़ी के कुछ लेक्चरर बस से उतरे और दो रुपए वाला टिकिट खरीद अन्दर जाने लगे तभी उन्होंने कालेजिएट ब्रांच के एक उपसचिव की कार अन्दर आती देखी और वे ठिठक गए। तबादलों के मामले में डरे हुए ये लोग उसे मक्खन लगाते क्योंकि यह रविवार की मुक्त सुबह थी और ऐसा वक्त इन कामों के लिए उपयुक्त होता है, पर वह उपसचिव अपनी पत्नी को साथ ले कमिश्नर की तरफ चला गया जो अकेले खड़ा चुरुट पी रहा था।

वे लेक्चरर उन छात्रों से बातें करने लगे जो इलिज़ाबेथ टेलर को देखने आए थे। धीरे-धीरे जमघट बढ़ा। हाथ मिलने लगे। सजी-सँवरी अफसरों की पत्नियाँ साड़ी का पल्लू समेट परस्पर नमस्ते करने लगीं। बॉलकनी के टिकिट बेचने वाली खिड़की के सामने क्यू बढ़ता गया। राजधानी में सरकारी काम से आए ज़िले के वे दोनों अफसर जो चौड़े पाचये के पतलून और बन्द गले के कोट पहने थे अपनी बढ़ी हुई तोंदों के बावजूद झुके-झुके जा रहे थे। उनके लिए यह दिव्य अवसर था, जब सारे बड़े अफसर एक जगह अच्छे मूड में उपस्थित थे और उन्हें सबको सलाम करने का मौका मिल रहा था।

कुछ अफसर सचमुच अच्छे मूड में थे। पर सभी नहीं। सामान्य रूप से वातावरण गंभीर था। कमिश्नर ने किसी सेक्रेटरी की बात पर ठहाका लगाया तो सब चौंक पड़े थे। कोई हँस नहीं रहा था। पीस कोर वाली दो अमरीकी छोकरियाँ जब बहुत घुल-मिलकर संचालक कृषि विभाग से बातें करने लगीं तो युवा अफसरों का ध्यान उस ओर गया। जब बड़े अफसर की कार आई और वह अपनी पत्नी, लड़के व दो लड़कियों के साथ उतरा तब सब बातें बन्द कर उस ओर देखने लगे। उसने घूम-घूमकर सबको देखा, हाथ मिलाए कुछ से, कुछ की ओर देख सिर्फ मुस्कराया और बोला, “जब सभी लोग यह पिक्चर देखने आए हैं तो यह ज़रूर अच्छा पिक्चर होगा।”

सबके चेहरों पर मुस्कराहट तैर गई। बड़ा अफसर अँधेरे ठण्डे कमरों में जीवन-भर बैठा रहा है। उसके लिए वह दस बजे की धूप सहन करना कठिन था। उसने घड़ी देखी और कमिश्नर से कहा, “अभी वक्त है, क्यों नहीं हम लोग हॉल में चलकर बैठें!”

इस पर सब लोग हॉल में जाने लगे। लोगों ने जल्दी से अपनी सिगरेटें बुझाईं और अन्दर चले। बड़े अफसर के अन्दर जाने के बाद अब बाहर रहने का कोई धर्म नहीं रह गया था। क्यू ज्यों का त्यों बना हुआ था क्योंकि लोग देर से भी आ रहे थे। पर अब सबको जल्दी थी। वे हॉल में अच्छी सीट चाहते थे जो असम्भव थी, क्योंकि टिकिट पर नम्बर थे। बैठने के बाद वे इधर-उधर देख पता लगा रहे थे कि कौन-कौन आया है। जिनकी लाइन के पीछे या आगे सुन्दर लड़कियाँ बैठी थीं वे परस्पर ज़ोर-ज़ोर से बातें कर रहे थे और बिला वजह छोटी-छोटी बातों पर हँस रहे थे। उनका ख्याल था कि उनकी बातों से लड़कियाँ प्रभावित हो रही हैं। शायद वे हो भी रही हों क्योंकि वे अपने चेहरे और कपड़ों पर बहुत ज़्यादा ध्यान देनेवाली मूर्ख लड़कियाँ थीं जो रिचर्ड बरटन को देखने और एलिज़ाबेथ टेलर से नई अदाएँ सीखने आई थीं।

पिक्चर शुरू हुई। माथा और जार्ज धीरे-धीरे पार्टी से लौट रहे हैं। वे घर में घुसते हैं। तब पहली बार एलिज़ाबेथ टेलर का चेहरा स्क्रीन पर आता है।

“यह है वर्जीनिया वुल्फ!” अंडर सेक्रेटरी मिस्टर पन्त ने धीरे से पास बैठी अपनी मोटी-सी पत्नी से कहा।

“हमें तो ‘वरजिन’ नहीं लगे।” पत्नी ने कहा।

“अरे नाम है वर्जीनिया वुल्फ इसका। ‘वरजिन’ से क्या सम्बन्ध।” मिस्टर पन्त ने कहा।

“तो अपने को मिसेज़ वुल्फ कहे ना सुसरी। वर्जीनिया काहे को लगाती है जब है नहीं।”

“अच्छा चुप रहो।” मिस्टर पन्त नज़रें गड़ाकर सामने स्क्रीन पर वर्जीनिया वुल्फ को देखने लगे।

इधर डिप्टी डायरेक्टर रामकरण जैन की पत्नी ने अपने पति से झुककर कहा, “हमें तो यह खेल सायको जैसा लगे।”

“नहीं सायको जैसा नहीं। मज़ाकिया खेल है।”

“हाँ भाई, खून-खच्चर हो तो हमें बता देना। हम बाहर जाकर बैठ जाएँगी।” वह बोली और फिर पास बैठी गुप्ता जी की पत्नी को बताने लगी कि सायको देखने के बाद उन्हें कैसे नींद नहीं आई थी पूरी रात।

मोयटे साहब स्वभाव से मसखरे हैं। वे, आनन्दस्वामी और बंसीघर अलग ग्रुप बनाए कोने में बैठे थे। मोयटे ने बंसीधर के कान में कहा, “कुछ भी कहो, अब यह एलिज़ाबेथ टेलर बुढ़िया लगने लगी।”

“हूँ, वह बात नहीं प्यारे जो पहले थी!” बंसीधर ने एक रसिक की पीड़ा से उत्तर दिया।

“पहले क्या जलवा था इसका!”

“आय हाय!”

इसी समय मार्था को दिए जार्ज के किसी उत्तर पर डिप्टी सेक्रेटरी मेहता ज़ोर से हँस दिए। मेहता दो बार यूरोप का दौरा कर चुके हैं। एक बार अमरीका भी हो आए हैं। उन्हें अंग्रेज़ी समझ में आती है। ज़ाहिर था कि वे हँसे हैं तो ज़रूर कोई मज़ाक की बात होगी। उन्हें हँसता देख कुछ और लोग भी हँसने लगे। कुछ लोगों को अफसोस हुआ कि उनसे कोई मज़ेदार डायलॉग मिस हो गया। वे कान खड़े कर डायलॉग पकड़ने की चेष्टा करने लगे। पर शीघ्र ही उन्हें थकान अनुभव होने लगी।

कतार में बैठी उन मूर्ख लड़कियों में से एक ने पासवाली से कहा, “बरटन कितना हैण्डसम लगता है ना!”

“तुझे लगता होगा, मुझे नहीं लगता।”

“कैसी है, सुना!” उसने दूसरी लड़की से कहा, “कहती है, मुझे बरटन हैण्डसम नहीं लगता।”

“हाय रे!” उसने ताज्जुब से देखकर कहा, “क्यों री, तुझे बरटन हैण्डसम नहीं लगता?”

“यह कह रही है कि मुझे बरटन हैण्डसम लगता है तो मैंने कहा तुझे लगता होगा, मुझे नहीं लगता।”

“मैंने ऐसा थोड़े कहा। मैंने कहा बरटन हैण्डसम लगता है।”

“वही मतलब, वही मतलब।”

“वही मतलब कैसे। मैंने ऐसा थोड़े कहा कि सिर्फ मुझे ही हैण्डसम लगता है। सबको लगता है।”

“इसको तो शशधर सबसे हैण्डसम लगता है।”

“चुप।” उसने चिकोटी काटी।

“उई।”

कॉलेजिएट ब्रांच के मिस्टर पई ने गर्दन घुमाकर पीछे की सीट पर बैठी इन लड़कियों को देखा, जिनके शोर के कारण वे पिक्चर समझ नहीं पा रहे थे। बदले में मिस्टर पई की ओर उन लड़कियों ने घूरकर देखा और मुँह बिचका दिया। मिस्टर पई सामने देखने लगे। लड़कियाँ चुप हो गईं। अब लड़कियाँ चुप थीं मगर मिस्टर पई अभी भी कुछ समझ नहीं पा रहे थे। वे सचिवालय के उन चन्द लोगों में से थे जिनका इंग्लिश ड्राफ्टिंग श्रेष्ठ माना जाता था और चीफ भी जिसमें कभी हेर-फेर नहीं करता था। अजीब स्थिति थी। चित्र अँग्रेजी में था पर वे सब कथा का सूत्र पकड़ नहीं पा रहे थे। वे सब अपने ढंग से आधुनिक थे। देशी भाषा के लिए नफरत रख अंग्रेज़ी की मदद से उन लोगों ने अपना व्यक्तित्व बनाया था फिर भी चित्र समझ नहीं आ रहा था। पर वे उठकर बाहर नहीं जा सकते थे। वे सब एक-दूसरे को देखते हुए बैठे थे।

दर्शकों का एक बहुत छोटा प्रतिशत कहानी को समझ रहा था। बाकी सब यह अपेक्षा कर रहे थे कि बरटन बार-बार टेलर को चूमेगा। वह चूम नहीं रहा था। वह उसे तलाक भी नहीं दे रहा था, गोली भी नहीं मार रहा था। ऐसा कुछ नहीं हो रहा था जिसकी वे सब उम्मीद करते थे। चित्र रविवार के रंगीन बुश्शर्ट, नैरो पतलून की मखौल उड़ाता चल रहा था। वे सब चित्र देख रहे थे। उनका चीफ देख रहा था, वे देख रहे थे।

इसी बीच एक कॉलेज का लड़का अपनी सीट से उठा और जेब में हाथ डाले धीरे-धीरे बाहर निकल गया। उसे जाता देख सब हँसे। हँसकर उन लोगों ने यह सिद्ध किया कि वे चित्र को समझ रहे हैं और यह लड़का नहीं समझ रहा।

इण्टरवल में वे सब उठे और बाहर आए। वे कोकाकोला पीने लगे और एक-दूसरे से हाथ मिलाने लगे। वे सब अंग्रेज़ी में बातें कर रहे थे और बहुत बुद्धिमान लग रहे थे। उनके उच्चारण सुधर गए थे। वे कंधे उचकाकर, हाथ फैलाकर बहुत अच्छी फ्रेज़ेज़ बोल रहे थे। चित्र न समझ पाने के हीन भाव से मुक्ति के लिए वे खूब ठहाके लगा-लगाकर बातें कर रहे थे। उस समय उनपर गर्व किया जा सकता था। स्मार्ट, इंटेलिजेण्ट, शार्प, आधुनिक और सुन्दर पत्नियों के साथ वे लोग बहुत अच्छे लग रहे थे।

चित्र में जैसे-जैसे तनाव बढ़ा वे लोग एलिज़ाबेथ टेलर की एक्टिंग के कायल होते गए। शब्द नहीं मात्र अभिनय-कला प्रभाव छोड़ रही थी। वे देख रहे थे और चित्र के समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

चित्र समाप्त हुआ। वे उठे। उनके चेहरों पर प्रसन्नता थी। एक अच्छा चित्र देखने का सन्तोष लिए वे उठे। किसी को देख ऐसा नहीं लगता था कि उसे कुछ समझ नहीं आया। वे सन्तुष्ट थे। वे जो अपेक्षा करते थे मानो वही उन्हें मिला हो। वे धीरे-धीरे एक-दूसरे की पत्नियों को सम्मान से मार्ग देते, मुस्कराते बाहर आए।

आते ही उनमें स्फूर्ति आ गई। लंच का वक्त हो रहा था। इसमें देर करना आधुनिकता और अफसरी के खिलाफ है। वे अपनी कारों में घुस हॉर्न बजाते एक-दूसरे से रास्ता माँगने लगे। सिनेमा घर का अहाता जल्दी खाली हो गया। ज़िले से दौरे पर आए वे दोनों अफसर सबसे बाद में निकल पूरी-साग की दुकान की ओर बढ़े।

“यह बड़ा अच्छा रहा। सबसे मुलाकात हो गई। बड़े अफसरान के दर्शन हो गए। कुछ खबरें पता लग गईं।”

“कौन-सी खबरें?”

वे सचिवालय के तबादलों की ताज़ी खबरें सुनाते दुकान में घुस गए।

सोमवार को फाइल बगल में दाबे छोटा अफसर बड़े अफसर के कक्ष में घुसा और ‘गुड मॉर्निंग’ करने के बाद बोला, “कल की पिक्चर कैसी लगी, सर?”

बड़ा अफसर एक मिनट गम्भीर रहा। सोचता रहा कि क्या कहे। फिर उसने कंधे उचकाए और बोला, “इट वाज़ ए नाइस मुवी, ऑफकोर्स।”

दोपहर को छोटे अफसर ने आगाशे को बताया कि बड़े साहब को पिक्चर पसन्द आई। वे कह रहे थे कि इट वाज़ ए नाइस मुवी। दोपहर बाद एकाएक सभी लोग ‘हू इज़ अफ्रेड ऑफ़ वर्जीनिया वुल्फ’ की तारीफ करने लगे।

“क्यों भाई, कल की पिक्चर कैसी लगी?”

“इट वाज़ ए नाइस मुवी।” जवाब मिलता।

शाम तक उन लोगों को जो पिक्चर जा नहीं सके थे, अफसोस होने लगा कि उनसे एक ऐसा चित्र छूट गया जिसकी सब प्रशंसा कर रहे हैं।

रात को गुप्ता जी की पत्नी ने पति से कहा, “दस रुपए का नोट उड़ गया उस अंग्रेज़ी फिल्म के पीछे। उसकी बजाय ‘पड़ोसन’ देखते।”

“अब क्या बताएँ ! सब देखने जा रहे थे तो हम भी चले गए।” कुछ देर रुककर बड़बड़ाने लगे, “हू इज़ अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वुल्फ। वर्जीनिया वुल्फ से कौन डरता है? सब डरते हैं साले, सब डरते हैं! किसी के बाप में हिम्मत नहीं कि ज़रा बोल दें।”

फिर वह ज़ोर-जोर से हँसने लगे।

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शरद जोशी
शरद जोशी (१९३१-१९९१) हिन्दी जगत के प्रमुख वयंग्यकार थे। आरम्भ में कुछ कहानियाँ लिखीं, फिर पूरी तरह व्यंग्य-लेखन ही करने लगे। इन्होंने व्यंग्य लेख, व्यंग्य उपन्यास, व्यंग्य कॉलम के अतिरिक्त हास्य-व्यंग्यपूर्ण धारावाहिकों की पटकथाएँ और संवाद भी लिखे। हिन्दी व्यंग्य को प्रतिष्ठा दिलाने प्रमुख व्यंग्यकारों में शरद जोशी भी एक हैं। इनकी रचनाओं में समाज में पाई जाने वाली सभी विसंगतियों का बेबाक चित्रण मिलता है।

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