राजेन्द्र देथा

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Mahavir Prasad Dwivedi

मेरी आँखों का दौलतपुर

बीता हुआ और बीत रहा हर एक क्षण स्मृति बनता चला जाता है। कुछ स्मृतियाँ सिर्फ़ स्मृतियाँ न रहकर अंतस पटल पर शिलालेख-सी अमिट...
Gaurav Bharti

कविताएँ : जुलाई 2020

माँ ने नहीं देखा है शहर गुज़रता है मोहल्ले से जब कभी कोई फेरीवाला हाँक लगाती है उसे मेरी माँ माँ ख़रीदती है रंग-बिरंगे फूलों की छपाई वाली चादर और...
Ullas Pandey

उल्लास पाण्डेय की कविताएँ

1 इस नीरवता में जैसे खींची गई लकीर के दोनों ओर मैं खड़ा हूँ एक खाई की तरह, मेरे बीचों बीच कोई फ़्रंटियर है जिससे मैं अछूता हूँ जैसे अब तक...
Srilal Shukla

अंगद का पाँव

वैसे तो मुझे स्टेशन जाकर लोगों को विदा देने का चलन नापसंद है, पर इस बार मुझे स्टेशन जाना पड़ा और मित्रों को विदा...
Couple holding moon

संतुलन, संगीत

संतुलन 1 आश्चर्य है, हँसने के लिए कारण खोजता व्यक्ति रो देता है अकारण! किसी को प्रेम करना उसकी दुःख-निधि पर अपना अधिकार जमाना है, किसी से प्रेम पाना उसके सुखों...
Woman Face Painting

अनूदित पीड़ाएँ

आसमान साफ़ होकर भी धुंधलाया था। पीड़ा के खंडित अवशेष पाषाण नहीं होते हमेशा। अनूदित पीड़ाएँ लहलहाते खेतों में बंजर अवशेष थीं। सम्पन्नता में विपन्न जी रहीं अधमरी फसलें... अपुष्ट कुपोषित! कलकल छलछल बहती नदियों...
Scared Woman

स्वाति पांडेय की कविताएँ

विदा की आँच पर झोंक दी जातीं लड़कियाँ विदा की आँच पर झोंक दी जाती हैं अक्सर अपरिपक्वता की रेखा पर कूदती-फानती लड़कियाँ दुगुने-तिगुने उम्र की भट्ठी...
Rohit Thakur

एक मौसम को लिखते समय

मैं सही शब्दों की तलाश करूँगा लिखूँगा एक मौसम, एक सत्य कहने में दुःख का वृक्ष भी सूख जाता है घर जाने वाली सभी रेल विलम्ब से चल रही...
Manjula Bist

सिर्फ़ व सिर्फ़ अपने बारे में

पागल स्त्री की चीख़ पर कोई कान नहीं दे रहा है भटकते लोगों की बड़बड़ाहट का कोई अर्थ नहीं है संततियाँ पालकों से अधिक ऐप में...
Gaurow Gupta

प्रेम में – 2

मुझे विश्वास है एक रोज़ मैं मारा जाऊँगा— किसी युद्ध में नहीं प्रेम में प्रेम में मारा जाना दुनिया की सबसे अच्छी नियति है आप स्वर्ग और नरक नहीं जाते आप रहते...
Bhisham Sahni

माता-विमाता

पंद्रह डाउनलोड गाड़ी के छूटने में दो-एक मिनट की देर थी। हरी बत्ती दी जा चुकी थी और सिग्नल डाउनलोड हो चुका था। मुसाफ़िर अपने-अपने...
Farmer, Field

भयानक है छल : भाग-1

धूप तेज़ होने लगी थी आसमान में तैरने लगा हल्का-सा एक बादल सुदूर जंगल से घर लौटते हुए लकड़ी का गठ्ठर सिर पर उठाए तातप्पा के भीतर गहराता जा रही है अपनी...
Adarsh Bhushan

अमलदारी

इससे पहले कि अक्षुण्णताओं के रेखाचित्र ढोते अभिलेखागारों के दस्तावेज़ों में उलटफेर कर दी जाए, उन सारी जगहों की शिनाख़्त होनी चाहिए जहाँ बैठकर एक कुशल और समृद्ध समाज की कल्पनाओं के...
Prabhakar Machwe

प्रामाणिक अनुभूति (‘हरी घास पर क्षण भर’ : अज्ञेय)

'हरी घास पर क्षण भर' : अज्ञेय गेटे ने एक जगह लिखा है कि "आजकल के कवि अपनी स्याही में बहुत-सा पानी डाल देते हैं।" और...
Indian Old Woman

कुछ जोड़ी चप्पलें, इमाम दस्ता

कुछ जोड़ी चप्पलें उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मनुष्य होने के दावे कितने झूठे पड़ चुके थे तुम्हारी आत्म संलिप्त दानशीलता के बावजूद, थोड़ा-सा भूगोल लिए आँखों में वे बस...
Ahmad Nadeem Qasmi

एक दरख़्वास्त

ज़िन्दगी के जितने दरवाज़े हैं, मुझ पे बंद हैं देखना— हद्द-ए-नज़र से आगे बढ़कर देखना भी जुर्म है सोचना— अपने अक़ीदों और यक़ीनों से निकलकर सोचना...
Prabhat

हमें नहीं पता

तुम अगर मिल सकती होतीं या मैं तुमसे मिल सकता होता तो ज़रूर मिल लेते बावजूद हमारे बीच फैले घने कोहरे के इसी में ढूँढते हुए हम एक-दूसरे...
Kirti Chaudhary

सुख

रहता तो सब कुछ वही है ये पर्दे, यह खिड़की, ये गमले... बदलता तो कुछ भी नहीं है। लेकिन क्या होता है कभी-कभी फूलों में रंग उभर आते हैं मेज़पोश-कुशनों...
Women at beach

मन का घर, तुमसे विलग होकर

मन का घर उसके मन के घर में गूँजती रहती हैं टूटती इच्छाओं की मौन आवाज़ें उसमें हर बालिश्त दर्ज होती जाती है छूटते जा रहे सपनों से पलायन की एक लम्बी...
Bashar Nawaz

वक़्त के कटहरे में

सुनो तुम्हारा जुर्म तुम्हारी कमज़ोरी है अपने जुर्म पे रंग-बिरंगे लफ़्ज़ों की बेजान रिदाएँ मत डालो सुनो तुम्हारे ख़्वाब तुम्हारा जुर्म नहीं हैं तुम ख़्वाबों की ताबीर से...
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