राजेन्द्र देथा की कविताएँ

Poems: Rajendra Detha

नींद क्यूँ नहीं आती

ध्यान से प्रिय पाठक, ध्यान से
इधर कविता में दो आदमी हैं-

रामेश्वर हमारे इधर के सिंचाई मंत्री हैं
उनका गार्ड हमारे इधर का ही है
बताता है कि उन्हें नींद नहीं आती,
सम्भवतः कारण यही कि अगले महीने
चुनाव है, कुर्सी बदली न जाए कहीं।
और
रशीद मेरे गाँव बीजेरी के हैं
शुभान उसका मौसेरा भाई है
मेरा बचपन का दोस्त
वो कहता है उसे भी नींद नहीं आती
सम्भवतः कारण यही कि अगले महीने
केसेसी* की किस्त भरनी है, उसे बदलनी है।

नींद दोनों को नहीं आती
मंत्रीजी की नींद चार दिन की छुट्टी पर है
रशीद की लम्बी छुट्टी पर
मंत्री जी को भत्ता मिलेगा
रशीद को शायद कंटोल के गेंहूँ भी नहीं!

[केसेसी- बेंक द्वारा किसानों को दिया जाने वाला लोन]

मैं कविता सीख गया था

इधर जब से इस शहर में आया
सच कहूँ तो बहुत प्रभावित हुआ
इस शहर से और कुछ समय बाद
इस शहर के बड़े साहित्यकारों से
मसलन मैंने जाना शुरू किया
गोष्ठियों, बड़े कार्यक्रमों, सम्मेलनों में
मेरा जाने का कारण उन दिनों यही
था कि सीखनी है अपने को कोई ढंग
की कविता करनी और बड़ी प्यारी कविता
यह बात और है कि मैं अपनी मर्ज़ी से
यह नुस्खा नहीं अपना रहा था,
यह नुस्खा मुझे मेरे अभिन्न
साथी ने दिया था जो कि स्वंय
अब स्थापित होने के कगार पर है
मैं जाता, बड़े लोगों से परिचित रूप से सम्बन्ध बनाता
बातें करता, उनकी किताबों पर लिखने के लिए कहता
जायज़ है उनकी ख़ुशी अपार होती,
कुछ अच्छे थे वे मुझे जान चुके थे

इधर मैं हमेशा आलोचना की किताबें पढ़ता
भारतीय कविता संचयन की किताबें भी पढ़ीं
लेकिन कविता नहीं बनी तो नहीं बनी

मैं थका हारा यह शहर छोड़ जा चुका था
अपने गाँव की सीम में अपने खेत पर
मैं जाने लगा अब हमेशा
गाँव की उस दुकान पर
और बैठता इत्मिनान से
सुनता सरपंच की दबंगई की बातें
डरता मैं भी कुछ बदमाशों की बातें सुनकर
मैं उसी दिन अपने उक्त अभ्यास पर
रो रो कर कहने लगा-
भले मानुष कविता यहाँ थी
तू ने वहाँ क्या ढूँढा मात्र
बतकही के अलावा!

रामेश्वर बदलता क्यूँ नहीं

हमारे विद्यालय के दिनों में,
हम जब बहुत अबोध थे
गुरुजी एक बात कहा करते थे
दुनिया रोज़ बदलती है

अब मुझे जब भी वो गुरुजी मिलेंगे
मैं ज़रूर पूछूँगा उनसे एक बात कि
सर ये जेके लॉन के आगे बनी रोड
और रोड के बीच बने फुटपाथ पर सो रहा
रामेश्वरलाल बदलता क्यूँ नहीं?

गाँव की औरतें

उधर जब महानगरों में हमारे गाँव की
औरतों पर लिखी जा रही थीं
कहानी, कविता और लघुकथाएँ
ठीक उसी वक़्त ये तीनों विधाएँ
अबोली बैठी दुःखी हो रो रही थीं
शब्दों को पकड़कर ठूँसा जा रहा था
मात्राएँ विलाप कर रही थीं
अनुस्वार माथा पकड़ बैठे थे
उधर कविता लिखने के ठीक बाद
कवि और कवयित्रियों ने खोल
दिए थे सीट बेल्ट अपनी कारों के
मौसम के मुताबिक़ और पहुँचना था उन्हें
किसी रात्रि भोज में अपने वरिष्ठों के बताये पते पर

इधर सहसा सुगनी को बताया गया कुछ यूँ कि –
तुम पर लिखी जा रही तुम्हारे लिए कविता
दिल्ली के आलीशान बंगलों में

सुगनी ओढ़नी का पल्ला उठाए
करती रहती है सूड़ बैरानी ज़मीं का
उसे लिखी गई तमाम ये विद्रोही कविता
आलोचकों द्वारा सराही गई तमाम कहानियाँ
बड़ी संस्था द्वारा पुरस्कृत अनेकों कविताएँ
न जानें क्यूँ अच्छी नहीं लगती!

अपने गाँव के बारे में

जिस दिन पूछा जाएगा मुझसे
मेरे गाँव के अस्तित्व के बारे में
टूटी झोपड़ियों के बारे में
गाँव में खेल रहे नादानों के बारे में
मैं नामजद करवाऊँगा
शहर के कुछ बनियों और
गाँव की कुछ नवविवाहिताओं के नाम!

औचित्योसिद्धी

तमाम रूमानी कवि-कवियत्रियाँ,
मानवतावादी लेखक-लेखिकाएँ
जिस दिन स्वयं के लिखे को
क्रियान्वित कर लेंगे अपने स्तर तक
उस दिन लिखी जाएगी
एक सच्चे इल्म से सरोबार
‘औचित्योसिद्धी’ नाम से
एक सुंदर पुस्तक
जिसके समकक्ष न
छप पाएगी कोई
अन्य किताब!

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