‘कैवल्य’ – आत्मावलोकन की कविताएँ

आत्मावलोकन और प्रेम आखरों का संग्रह है – कैवल्य

किताब – कैवल्य (कविता संग्रह)
रचनाकार – अंजना टंडन

‘कैवल्य’ अंजना टंडन का पहला कविता संग्रह है जो बोधि प्रकाशन की योजना, कवि दीपक अरोड़ा की स्मृति में – इस वर्ष चयनित हुई किताब है। उम्र के लम्बे समय के बाद अंजना टंडन जी की कविताएँ सामने आयी हैं। दरअसल यह देरी साहित्यिक मुजब से भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि धैर्य भी कविता में नए प्रतिमान लाता है। ये कविताएँ रचनाकार के समझ के दिनों से ही अपने अंदर पलती आ रही होंगी शायद। और उसे रूप अब दिया गया।

संग्रह की सभी कविताएँ एक शिल्प और बिम्ब से गुंथी कविताएँ है, जो अहिंदीभाषी समझने में देर कर सके ऐसी, लेकिन उन्हें धैर्य से पढ़ें तो आराम से उन्हें आत्मसात किया जा सकता है। साठोत्तरी के बाद अस्तित्ववाद या व्यक्तिवाद की एक कविता की धारा आयी जो नई कविता कहलायी, और छंद मुक्त का रूप देने के लिए किया गया नवाचार था कविता में। उसी तरह की कविता इस संग्रह की कुछ कविताएँ दीख पड़ती हैं। जनवादी कविता से इसे जोड़ना ग़लती ही होगा। वह अशिल्पी कविताओं का दौर था और उनमें भी जटिल कवियों की कविताई अलग। दरअसल ये कविताएँ अपने भीतर पले-बढ़े हमउम्र विचारों और आत्म की कविताएँ है, जिन्हें पढ़ते वक़्त सहज ही एक अलग अनुभूति होती है।

यह आश्चर्य ही है कि कवयित्री स्वयं प्रणिशास्त्र की आचार्य होकर भी कविता में इतने व्यापक दायरे के और इतने शिल्पी शब्द लाती हैं। यह सुखद बात लगी। हिन्दी की वरिष्ठ कवियित्री अनामिका संग्रह के बारे में लिखतीं है कि जिस बात के लिए यह संग्रह याद किया जाएगा वह है इसकी उत्कट बिम्बधर्मिता। संग्रह की पहली कविता ही सहेजने योग्य है। कौंधती स्मृतियों पर लिखी गई यह कविता कितनी ग्राह्य है। वे लिखती हैं-

“सच है
अवशेषी स्मृतियों के लिए
कोई मणिकर्णिका घाट नहीं होते…”

जब गुरुजी डॉ. सत्यनारायण जी से पहली बार मैंने कहा कि सर यह कलावादियों की कविता मेरे तो समझ में ही नहीं आतीं तो उनका ज़वाब था कि ज़रूरी नहीं कि कोई कविता तुम्हें ही समझ आए। कलावादी कविताएँ या रूपवाद के खोल चढ़ी कविताओ में पाठक को इंटरेस्ट करने की कितनी क्षमता है, मतलब स्वयं कविता में स्वलक्षणिता का गुण होता है।

प्रेम शाश्वत होता है उसे प्रकट करने, न करने से कोई उसकी इकाई में परिवर्तन नहीं होता, हाँ उसे कितना आप निज कर पाते है, प्रेम की धर्मिता वही।प्रेम की निस्वार्थ और यथार्थ बात पर कविता ‘सरहद के मरहम’ नया रूप देती हुई कविता है। इस उलझन और कठिन समय पर अंजना जी लिखती हैं-

“कितने उलझे हैं सभी
आपाधापी में
जबकि इस समय लिखी
जानी चाहिए थीं
दुनिया की सबसे
तरलतम कविताएँ
प्रेम कविताएँ!”

संग्रह की कविताएँ आत्म की कविताएँ और प्रेम – स्त्री पर रचित कविताएँ है। कभी कमज़ोरी की बात की जाएगी तो मात्र यही कि कविताओं का व्यापक दायरे का न होना। ख़ैर पहला संग्रह है और उम्र के उस दौर का संग्रह है जब याददाश्त के साथ ज़िन्दगी एक कप चाय के साथ ढली जाती है। वे याददाश्त कविता में काल दौर और विस्मृत होने पर लिखती भी हैं कि –

“हम उस दौर में हैं
जब सिकुड़ने लगती है याददाश्त
और असंख्य शाप पीछा करते है…”

अंजना जी की कविताओं में आज के छद्म स्त्रीवाद और बीमार कविताओं का जो सिर्फ़ पुरुष को देह तक ही सीमित मानती है, नहीं है। हाँ बदलाव की उम्मीद ज़रूर करती हैं। लेकिन हड़बड़ी से नहीं। संग्रह में स्त्री पर क्रमबद्ध कुछ कविताएँ हैं। ‘बदलाव’ कविता में वे लिखती हैं-

“देखना
एक दिन समय से पहले
तैयार हो जाएँगी सारी स्त्रियाँ
और तब पुरुष अचम्भित-सा दाढ़ी खुजला कर तिनके ढूँढ रहा होगा।”

इन्हीं कविताओं में एक कविता ‘लौटती सभ्यता’ जहाँ आज के बर्बर समय में मानव मूल्यों के अवनमन का वर्णन करती है, वहीं बूंद भर चाह में मुक्त होना चाहती है। कविताओं में एक सहज दर्शन विषयों का रूप देखने को मिलता है। वहीं कवयित्री ईश्वर की सार्थकता पर प्रश्न चिह्न लगाती हुई जाती है।

कविताओं में ख़ास तरह की उदासी का रूप देखने को मिलता है, और उसी की उपज है ‘उदासियों से विद्रोह’। वे इस कविता में लिखती हैं-

“एक उदासी कहीं
विद्रोह घोषित कर देती है
हर सजदे में अब नहीं जुड़ते उसके हाथ।”

वहीं ‘माफ़ियाँ’ इस संग्रह की पसंदीदा होने जैसी कविताओं में से एक है। ‘ईश्वर स्त्री ही होगा’ कविता सच में कविता की मुनादी पर खरी उतरती कविता है। अपने पिता और माता पर भी कविताएँ लिखी हैं। और उन्होंने इन्हें। बहुत प्यार उन कविताओं को। किताब की शीर्षक पर भी क्रमबद्ध कविताएँ हैं। ‘कैवल्य’ तीन कविता में सहअस्तित्व की खोज में निकली कविता कहती है कि –

“पाने से परे
तुम्हारा खोना ही
जीवन का उत्सव ठहरा।”

आज जहाँ बैठे बैठे कविताएँ लिखो का सिलसिला चल पड़ा है वहाँ रिल्के का एक कथन याद आता है कि ‘कविताएँ अनिवार्यता से उपजती हैं’। यह बड़ा सच है। कल्पित अपनी एक किताब में लिखते हैं कि कविता कोई दुधारू गाय नहीं होती जिससे हर समय काव्यार्थ दूहा जाऐ। अंजना जी भी ‘कविता का प्रसवकाल’ कविता में यही बात कहती हैं, वे लिखती हैं –

“कविता के प्रसव का कोई निश्चित काल नहीं होता।”

संग्रह में प्रेम पर ख़ूब सुन्दर कविताएँ है। तभी तो वरिष्ठ कवि गोविंद माथुर जी ने कहा है – “प्रेम में डूबी कविताएँ”। संग्रह की सभी कविताएँ बेहतरीन कविताएँ हैं। हाँ, इतना ज़रूर कहूँगा एक पाठक के नाते कि आगे की कविताओं में थोड़ी नरमी बरतें, ताकि सभी पाठक सहज रूप से समझ सकें।कविता को टेक्निकल होतीं देखते ही बचाव हो। संग्रह की सभी कविताओं पर बात करना किताब का रहस्य तोड़ देने जैसा है तब कि जब इसे एक मात्र पाठक प्रतिक्रिया के रूप में लिखा गया हो।

मेम इस संग्रह बाबत आपको ख़ूब बधाईयाँ और मायामृग सर के साथ समस्त बोधि टीम को बधाईयाँ।

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