मेरी सारी यात्राएँ
किसी अगणित एकान्त के
ऊहापोह में डूबी हुई हैं

इस देह को लिए फिरता मैं
अपने शयन कक्ष से एक
क्रमबद्ध पदचाप की ताल पर
किसी यात्रा का उद्घोष करता हूँ
और शून्य विस्थापन ढोता हुआ
पुनः यहीं लौट आता हूँ

भौतिकी की किताबें इसे यात्रा नहीं मानतीं
शून्य विस्थापन का त्वरण भी शून्य होता है
शून्य त्वरण बल उत्पन्न नहीं कर सकता
बलपूर्वक इस देह को धकेलने का प्रयत्न भी करूँ
तो यह देह मुझे इसके जड़त्व से बाहर नहीं निकलने देती

मैं जड़वत खड़े-खड़े देखता हूँ
शताब्दियाँ गिनती प्रतिमाएँ
धरातल पर खोदे हुए गड्ढे
युद्धों और आग्नेयास्त्रों के छाप ढोतीं
दीवारों के रक्तपोषित व्रण
प्रतीक्षाओं के पहाड़
गर्द खाती पांडुलिपियाँ
और सोचता हूँ कि
एक जगह जमकर समय के सापेक्ष
आगे बढ़ जाना भी एक यात्रा ही तो है

तो क्या ये सम्भव है कि
यह कक्ष भी एक यात्रा है
या कि यह मेरे विस्थापन का एक पड़ाव है
यात्रा बिना पड़ावों के सम्भव नहीं हो सकती
मैं खड़े-खड़े अपनी देह के जड़त्व के आधीन
अनिर्णीत गंतव्य की एक लम्बी यात्रा हूँ

इस यात्रा में
मैं पहले किसी की गोद में चला
फिर घुटनों के बल रेंगने लगा
उत्साह बढ़ा तो तलवों पर खड़े होकर
दीवार थामकर चलना शुरू किया
एक दिन सहसा दीवार खिसक गयी
मेरे घुटने फूट गए
फूटे हुए घुटने किसी भी यात्रा की पहली सीख हैं

जब पैरों के बल चलना शुरू कर दिया
तो मेरे गंतव्य निर्धारित कर दिए गए—
पहली यात्रा पिता के कन्धों पर हुई
दूसरी यात्रा मेरे घर के आँगन का गोलार्द्ध रहा
उसके बाद की सारी यात्राएँ
पैरों ने नहीं, पेट ने कीं

भूख विश्व की प्रत्येक यात्रा का विरोधाभास है
रात भूखे यात्रियों को निगल जाती है
यही कारण है कि रात में यात्रा करना एक वर्जना है

यात्राएँ पुराने प्रश्नों का यथोचित उत्तर हो ना हों
नए प्रश्नों का उद्गम अवश्य हैं
जिनका उत्तर
यात्रा और यात्री के अतिरिक्त
कोई नहीं जान सकता

यह एक निजी यात्रा है
जिसका उद्गम भी मैं हूँ
और गंतव्य भी मैं
लिहाज़ा भौतिकशास्त्र इसे भी असम्भव मानता है।

आदर्श भूषण की कविता 'आदमियत से दूर'

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आदर्श भूषण
आदर्श भूषण दिल्ली यूनिवर्सिटी से गणित से एम. एस. सी. कर रहे हैं। कविताएँ लिखते हैं और हिन्दी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है।

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