ऐसी जगह

‘Aisi Jagah’, a poem by Akhileshwar Pandey

तुम्हारे छतनार जूड़े में टाँकना चाहता हूँ
टहकार पलास का ऐसा फूल
जो मुरझाये नहीं कभी
हमारे प्यार की तरह

महुए सी मादक तुम्हारी आँखों में
लगाना चाहता हूँ रात का काजल

मैं तुमसे प्यार करना चाहता हूँ उतना
जितना नदी मछली से करती है
हवा ख़ुशबू से
ओस दूब से
और
भूख अन्न से

चिड़िया की बची हुई नींद
घड़ी से थोड़ा-सा ज़्यादा वक़्त
बारिश से उसका सूखापन
और
राख से नमी माँगकर
निकल पड़ेंगे हम सैर पर
एक ऐसी दुनिया में
जहाँ
जिया जा सके अपनी शर्त पर

आदर्श या आडम्बर के बिना
शहरी बनने का ढोंग किए बग़ैर
बिना छिपाये अपना गँवईपन

जहाँ सूरज के निकलने की शर्त
पूरब न हो
न हो चाँद के होने की शर्त
आसमान

देवता मन्दिर के बाहर भी
बिराजते हों
ऐसी जगह चलेंगे हम
जहाँ रोशनी को अँधेरा मिटाने का
गुमान न हो

न फूलने-फलने पर इतराते हों पेड़
जहाँ गेहूँ और गुलाब की खेतें
न हों अलग-अलग
ऐसी जगह ढूँढेंगे हम

फिर देखना तुम
तब डरेगा नहीं कोई प्रेमी
ताक़तवर मुस्कानों से

बीज अँकुरित होंगे
बिना प्रार्थना के

प्रेमियों को नहीं करना होगा
वसन्त का इन्तज़ार।

यह भी पढ़ें: ‘कैसे पता चला कि वसंत आया’

Book by Akhileshwar Pandey: