बस से उतरकर वह बाज़ार के चौराहे पर खड़ा हो गया। सामने टाउन हॉल की इमारत थी—लम्बी और भयावह। पहली मंज़िल पर लम्बी, मैली खिड़कियाँ थीं, जिनके शीशे पर शाम की धूप और भी मैली दिख रही थी। उससे हटकर कुछ दुकानें थीं—एक पब, एक नाई की दुकान और दो जनरल स्टोर। आगे छोटा-सा स्क्वैर था।

“आख़िरी बस कितने बजे जाएगी?”—उसने उसी बस के कंडक्टर से पूछा जिसमें वह आया था।

“दस बजे”—कण्डक्टर ने उड़ती हुई निगाहों से उसे देखा और ओवरकोट की जेब से बिअर की बोतल निकाल ली।

वह दुकानों की तरफ़ चला आया। वह यहाँ पहली बार आया था, किन्तु उसे विशेष अन्तर नहीं जान पड़ा। वह जब कभी प्राग से दूर छोटे शहरों में जाता था, वे उसे एक समान ही दिखायी देते थे। टाउन हॉल, चर्च और बीच में स्क्वैर और ख़ाली-सा उनींदापन।

हवा ठण्डी थी, हालाँकि मई का महीना आगे बढ़ चुका था। उसने अपने डफ़ल बैग से मफ़लर निकाल लिया। दस्ताने उसके कोट की जेब में थे। वह अभी उन्हें नहीं पहनना चाहता था। उसकी पीठ पर स्लीपिंग किट थी। अगर कहीं रात की बस वह नहीं पकड़ सका तो बाहर सो जाएगा। उसे होटल की अपेक्षा बाहर सोना हमेशा अच्छा लगता था—अगर ठण्ड ज़्यादा न हो।

जब पिछली बार गर्मियों में वह उसके साथ मोराविया गई थी, तो भी वे बाहर सोते थे। एक ही स्लीपिंग किट में। वे इसी तरह सारा मोराविया घूम लिए थे। उसके साथ पहले-पहल उसे बाहर सोने की आदत पड़ गई थी। होटल की बचत होती थी, उसे वे हमेशा बिअर पर ख़र्च कर देते थे।

वह कुछ देर तक पिछली गर्मियों के बारे में सोचता रहा। फिर उसने मफ़लर को अच्छी तरह गले और कानों से लपेट लिया।

ठण्ड काफ़ी है।—उसने सोचा—लेकिन असहनीय नहीं है।

असहनीय शायद कुछ भी नहीं है। उसके लिए भी नहीं। शुरू में वह बहुत डर गई थी। अब वह ठीक होगी। अब कोई डर नहीं है… उसने सोचा। अब बिल्कुल कोई डर नहीं है—उसने दुबारा अपने से कहा।

वह कुछ देर तक खाद्य पदार्थों के स्टोर के सामने खड़ा रहा, शो-विण्डों में ग़ौर से देखता रहा, फिर कुछ सोचकर भीतर चला आया।

दुकान में ‘सेल्फ़-सर्विस’ थी। उसने काउण्टर के नीचे से एक टोकरी निकाल ली। दोनों ओर लम्बी कतार में छोटे-बड़े टिन के डिब्बे रखे थे। इन दिनों ताज़े फल देखने को भी नहीं मिलते थे। उसने आड़ुओं और अनानास के दो टिन टोकरी में रख लिए। आधा किलो ‘सलामी’ और फ़्रेंच पनीर की कुछ टिकियाँ भी लिफ़ाफ़े में बँधवा लीं। उसे ‘फ़्रेंच चीज़’ हमेशा ही बहुत पसन्द थी। रात को जब कभी वह उसके कमरे में सोती थी, तो एक चूहे की तरह उसे बराबर कुतरती रहती थी।

स्टोर से बाहर निकलते हुए उसे कुछ याद आया और उसने दुबारा मुड़कर ‘लीपा’ का एक पैकेट ख़रीद लिया। अस्पताल में शायद उसके पास सिगरेट नहीं होगी।—उसने सोचा।

सारा सामान उसने अपने डफ़ल बैग में रख लिया। स्टोर से बाहर निकलकर उसे प्यास-सी महसूस हुई। समय काफ़ी है।—उसने सोचा। ज़्यादा नहीं है, लेकिन वह छोटी बिअर के लिए काफ़ी है। स्क्वैर पार करके वह ‘पब’ में चला आया।
वह बैठा नहीं। बार के काउण्टर के सामने खड़ा रहा।

“एक छोटी बिअर”—उसने कहा। बारमैन ने बिना उसकी ओर देखे एक मग बिअर नल के नीचे रख दिया। जब झाग मग से ऊपर चढ़कर बाहर निकलने लगा, उसने नल की टोंटी बन्द कर दी। एक मैले तैलिए से मग को साफ़ किया और उसके सामने रख दिया।

उसने मग होंठो से लगा लिया। बिअर कसैली और गुनगुनी-सी थी, फिर भी उसे बुरी नहीं लगी। बारमैन इस बीच जेब से एक सासेज़ निकालकर खाने लगा था। वह एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति था। उसकी नीली आँखें आँसुओं में तैर रही थीं।

“आप बता सकेंगे, अस्पताल किस तरफ़ है?”—उसने पूछा।

बारमैन ने ग़ौर से उसकी ओर देखा, फिर उसकी आँखें उसके स्लीपिंग-किट पर ठहर गईं— “क्या प्राग से आए हो?”

उसने सिर हिलाया।

वह तनिक सन्देह-भरी दृष्टि से उसकी ओर देखता रहा।

“टाउन हाल की दाईं तरफ़… सिमिट्री से ज़रा आगे।”—उसने कहा।

“क्या ज़्यादा दूर है?”—उसने पूछा।

उसने आधी कतरी हुई सासेज़ को अश्लील ढंग से ऊपर कर दिया— “एक किलोमीटर…” उसने हँसते हुए कहा।

उसने उसे धन्यवाद दिया, तीन क्राउन का नीला नोट काउण्टर पर रखा और बिना चेंज की प्रतीक्षा किए बाहर चला आया।

बाहर बसन्त का चमकीलापन था… वैसा बोझिल नहीं, जो गर्मियों में होता है… एक हल्का धुला-सा आलोक, जो लम्बी सर्दियों के बाद आता है।

दस मिनट का रास्ता था और वह तेज़ी से चल रहा था। उसे अब ज़्यादा घबराहट नहीं थी। उसे अब उतनी घबराहट नहीं थी, जितनी बस में हो रही थी। बिअर के बाद उसे हल्का-सा लग रहा था। स्क्वैर छोड़ने के बाद वह एक खुले रास्ते पर आ गया था। हवा ठहर गई थी और कभी-कभी दूर के खेतों में ट्रैक्टर का घुर्र-घुर्र स्वर मक्खी की भिनभिनाहट-सा सुनायी दे जाता था।

सिमिट्री के पास आकर उसने सिगरेट जलायी। फिर डफ़ल बैग को एक कन्धे से उतारकर दूसरे कन्धे पर लटका लिया। सिमिट्री के इर्द-गिर्द बर्वा के पेड़ थे और उनकी नई पत्तियाँ डूबती हुई धूप में झिलमिला रही थीं। कच्ची सड़क पर बर्फ़ के पिघलने से कहीं-कहीं दलदल जमा हो गया था और उन पर मोटर-लारियों और ट्रकों के निशान उभर आए थे। उसने अपने पैंट के पायँचे ऊपर चढ़ा लिए—उसे ख़ुशी हुई कि यहाँ उसे देखने वाला कोई नहीं है। लेकिन वह उसे देखकर ज़रूर हैरान हो जाएगी। वह शायद ख़ुश भी होगी, लेकिन इसके बारे में वह निश्चित नहीं था। उसने प्राग से आते समय उसे मना कर दिया था। वह नहीं चाहती थी कि किसी को कोई सन्देह हो सके। उन्होंने यह तय किया था कि वह दो दिन यहाँ अस्पताल में रहेगी, बाद में जब वह वापस प्राग आएगी, तो किसी को भी कुछ पता नहीं चलेगा।

अस्पताल के गेट के सामने वह रुक गया। छोटी-सी पहाड़ी के ऊपर उसकी इमारत किसी कॉलेज होस्टल की तरह दिखायी दे रही थी—उतनी ही आत्मीय और निर्दोष। अस्पताल की इमारतों में अक्सर जो ठिठुरता हुआ नंगापन होता है, वह उसमें बिल्कुल नहीं था।

उसने अपनी पैंट के पायँचे नीचे की ओर मोड़ दिए और दरवाज़ा खोलकर भीतर चला आया। सामने एक लम्बा कॉरीडोर था। बीच-बीच में फूलों के गमले रखे थे। साफ़-सुथरे फ़र्श पर कॉरीडोर के खम्भों की टेड़ी छायाएँ धूप में खिंच आयी थीं।

ज़ीने के पास उसे एक बड़ा-सा डेस्क दिखायी दिया। ऊपर रिसेप्शन का साइनबोर्ड लगा था। उसके पीछे एक स्त्री नर्स की पोशाक में बैठी थी, वह अख़बार पढ़ रही थी और उसका चेहरा नहीं देखा जा सकता था।

वह कुछ झिझकता हुआ डेस्क की ओर बढ़ा।

नर्स ने अख़बार से सिर उठाकर उसकी ओर देखा।

“किससे मिलना चाहते हैं?”

उसने नाम बताया। उसे लगा वह नर्स ही नहीं है, नर्स की पोशाक में वह एक स्त्री भी है। इस ख़याल से उसे कुछ सान्त्वना-सी मिली।

उसने डेस्क की दराज़ से एक लिस्ट निकाली।

“मैटर्निटी वार्ड में?”—उसने पूछा।

वह क्षण तक असमंजस में खड़ा रहा, फिर उसने माथे का पसीना पोंछा।

“मुझे यह नहीं मालूम। मैं पहली बार यहाँ आया हूँ। क्या आप लिस्ट में देख सकती हैं?”—उसने कहा। हालाँकि यह कहने की कोई ज़रूरत नहीं थी। वह पहले से ही लिस्ट देख रही थी।

“मैटर्निटी वार्ड में आपकी पत्नी का नाम नहीं है।”—नर्स ने प्रश्न-भरी दृष्टि से उसकी ओर देखा।

“वह मेरी पत्नी नहीं है।”

“वह मेरी पत्नी नहीं है।” —उसने कहा— “मेरा मतलब है, अभी तक हम विवाहित नहीं हैं…।” उसने डेस्पेरेट होकर मुस्कराने की कोशिश की। फिर उसे लगा कि यह स्पष्टीकरण न केवल निरर्थक है, बल्कि मूर्खतापूर्ण भी।

नर्स ने कुछ अजीब रूखे ढंग से उसकी ओर देखा और फिर धीरे से अपने बाल पीछे समेट लिए।

“आपको मुझे यह पहले बता देना चाहिए था।”—उसने कहा। उसके स्वर में खीझ नहीं थी, सिर्फ़ एक ठण्डी-सी विरक्ति थी। उसने डेस्क के भीतर से दूसरी लिस्ट निकाल ली। एक बार फिर नाम पूछा।

वह चुपचाप प्रतीक्षा करने लगा।

“पहली मंज़िल, दाईं तरफ़ सर्जिकल वार्ड।”—उसने सरसरी निगाहों से उसकी ओर देखा और फिर अख़बार पढ़ने लगी।

वह गलियारे के अन्तिम छोर पर पहुँचकर सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। दोनों तरफ़ दरवाज़े खुले थे। औरतें अपनी जुपानों (लम्बी स्कर्ट) में बिस्तरों पर बैठी थीं। दरवाज़ों के बाहर रस्सी पर नायलोन की जुराबें, ब्रेसियर और अण्डरवियर सूख रहे थे। हवा में एक खट्टी, गिलगिली-सी गन्ध ठहर गई थी, जो अक्सर औरतों की घरेलू देहों या कपड़ों से आती है। लोहे की रेलिंग पर रेत से भरी हुई लाल-नीली बाल्टियाँ लटक रही थीं—शायद आग बुझाने के लिए—उसने सोचा।

जब वह सर्जिकल वार्ड की ओर मुड़ा, तो उसे लगा जैसे किसी ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया हो। वह तनिक चौंककर पीछे मुड़ा। एक लम्बे क़द का हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति उसके सामने खड़ा था। उसने लम्बा सफ़ेद कोट और पाजामा पहन रखा था जो यहाँ डॉक्टरों की पोशाक होती है।

“किससे मिलना है?”—उसने पूछा।

उसने फिर नाम बताया।

“अच्छा… लेकिन इसे यहीं छोड़ देना होगा।”—उसने अँगूठे से उसके स्लीपिंग-किट की ओर इशारा किया।

उसने स्लीपिंग-किट पीठ से उतारकर एक कोने में रख दिया।

“इसमें क्या है?”—उसने उसके डफ़ल बैग की ओर देखा।

उसने चुपचाप कन्धे से बैग उतारकर उसके सामने रख दिया।

डॉक्टर ने सरसरी निगाह से बैग में रखे डिब्बों को देखा और फिर धीरे से हँस दिया।

“सो… यू आर दि मैन”—उसने अपनी भाषा छोड़कर अंग्रेज़ी में कहा।

“क्या मतलब?”

“कुछ नहीं…” वह फिर अपनी भाषा पर उतर आया था।

“बेड नं. 17… सिर्फ़ आध घण्टे। वह अभी बहुत कमज़ोर है” —उसने रूखे व्यावसायिक स्वर में कहा— “तुम भीतर जा सकते हो।”

लेकिन उसके बाद वह तुरन्त भीतर नहीं जा सका। कुछ देर तक वह डफ़ल बैग को बच्चों की तरह दोनों हाथों में लेकर खड़ा रहा।

दरवाज़े के पास एक ख़ाली ह्वील-चेयर थी। सामने एक बड़ा हॉल था। दोनों तरफ़ छोटे-छोटे क्यूबिकल थे और उनके बीच लम्बे, गुलाबी रंग के परदे लटक रहे थे। हर क्यूबिकल के पीछे एक मद्धिम-सी रोशनी टिमटिमा रही थी। हॉल के एक कोने में स्ट्रेचर पड़ा था। उस पर कुछ रूई की गन्दी पट्टियाँ थीं—शायद कोई नर्स जल्दी में उन्हें उठाना भूल गई थी।

वह भीतर चला आया। स्लीपिंग-किट उतारने के बाद उसे अपनी पीठ बहुत हल्की-सी लग रही थी। सत्रह नम्बर के आगे आकर खड़ा हो गया। भीतर निपट शान्ति थी। वह शायद सो रही थी।—उसने सोचा।

पहले क्षण में उसे वह दिखायी नहीं दी।

सामने एक बड़ा-सा बिस्तर था, बिल्कुल समतल और सफ़ेद। ऊपर दो लम्बी चादरें थीं और वे बिल्कुल सफ़ेद थीं। यह पता चलाना भी मुश्किल था कि सिरहाना किस तरफ़ है। बिस्तर पर कहीं भी कोई उतार-चढ़ाव नहीं था। एक क्षण के लिए उसे लगा, वह ख़ाली है।

वह ख़ाली नहीं था। चादर से उसका सिर बाहर आया, फिर आँखें। वह उसे देख रही थी, फिर एक छोटी-सी मुस्कराहट उसके होठों पर सिमट आयी। वह पहचान गई थी।

उसने आँखों से स्टूल की ओर इशारा किया। उस पर दूध से भरा एक कप रखा था।

“तुमने पिया नहीं?” उसने झुककर कहा।

“बाद में… इसे नीचे रख दो।”

उसने स्टूल बिस्तर के पास खिसका लिया।

“कब आए?”

“अभी कुछ देर पहले…।”

उसके होंठ जामुनी रंग के हो आए थे। जगह-जगह से लिपस्टिक की लाइन टूट गई थी।

“कब हुआ?”—उसने पूछा।

“सुबह…। अपना कोट उतार दो।”—उसने अपना कोट और डफ़ल बैग उतारकर स्टूल के पीछे रख दिया। खिड़की बन्द थी। नीचे उसका सूटकेस पड़ा था, जो वह प्राग से अपने साथ लायी थी।

“ज़्यादा देर तो नहीं लगी?”—उसने पूछा।

“नहीं उन्होंने क्लोरोफ़ॉर्म दे दिया था। मुझे कुछ भी पता नहीं चला।”—उसने कहा।

“मैंने तुमसे कहा था कि तुम्हें कुछ भी पता नहीं चलेगा… तुम मानती नहीं थीं।”—उसने मुस्कराने की कोशिश की।

वह चुपचाप उसकी ओर देखती रही।

“मैंने तुमको आने के लिए मना किया था।”—उसने कहा।

“मुझे मालूम है… लेकिन अब मैं यहाँ हूँ।”

वह बिस्तर पर झुक आया। उसने उसके भूरे बालों को चूमा… फिर होंठों को। कमरे की गर्मी के बावजूद उसका चेहरा बिल्कुल ठण्डा था। वह चूमता रहा। वह तकिए पर सिर सीधा किए लेटी रही।

“तुम अब सुखी हो?”—उसका स्वर बहुत धीमा था।

“हम दोनों पहले भी सुखी थे।”—उसने कहा।

“हाँ… लेकिन अब तुम सुखी हो?”

“तुम जानती हो… यह हम दोनों के लिए ठीक था… मैंने तुमसे पहले भी कहा था।”

चादर उसके वक्ष के नीचे खिसक आयी। उसने हरे रंग की नाइट-शर्ट पहन रखी थी। उस पर काले रंग के फूल थे। अपने कमरे में उन फूलों को देखकर उसकी देह में मीठा-सा तनाव उत्पन्न हो जाता था। अब वे उसकी आँखों को चुभ रहे थे।

“यह क्या है?”—उसने डफ़ल बैग की ओर देखा।

“कुछ नहीं… मैंने कुछ चीज़ें यहाँ ख़रीद ली थीं।”—वह बारी-बारी से हर चीज़ को बैग से निकालकर बिस्तर पर रखने लगा—आड़ू और अनानास के टिन, सलामी, फ़्रेंच पनीर, लीपा का पैकेट।

“तुम एक पनीर अभी लोगी?”

“नहीं… बाद में”—वह बिस्तर पर बिखरी चीज़ों को देखती रही।

“इन दिनों तुम्हें खाने-पीने में लापरवाही नहीं करनी चाहिए।”—उसने कहा।

“वहाँ किसी ने मेरे बारे में पूछा तो नहीं था?”

“नहीं… किसी को नहीं मालूम कि तुम यहाँ हो।”—उसने कहा। वह कुछ देर तक आँखें मूँदकर लेटी रही। उसके बाल पहले भी छोटे थे… तकिए पर सटे रहने के कारण अब वे और भी सिमट आए थे। पिछली गर्मियों में उसने उन्हें काले शेड में रंगा लिया था—सिर्फ़ उसे ख़ुश करने के लिए। उसे ज़्यादा अच्छे नहीं लगे थे। तब से वे फिर धीरे-धीरे भूरे हो चले थे, हालाँकि अब भी कहीं बीच-बीच में काला शेड दिखायी दे जाता था।

“तुम्हें थकान लग रही है?”—उसने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।

“नहीं…” उसने उसकी ओर देखा। फिर उसने उसका हाथ चादर के नीचे घसीट लिया। धीरे-धीरे वह उसे अपने पेट पर ले गई।

“कुछ फ़र्क़ लगता है?”—उसने पूछा। उसका हाथ उसके नंगे, गरम पेट पर पड़ा रहा।

“तुम्हें कोई तकलीफ़ तो नहीं है?”

“नहीं” —वह धीरे से हँस पड़ी— “अब मुझे बड़ा हल्का-सा लग रहा है। अब यहाँ कुछ भी नहीं है।” —उसने उसकी ओर देखा। उसके होंठों की रूखी लिपिस्टिक रोशनी में चमक रही थी। उसने धीरे से अपना हाथ बाहर खींच लिया।

“तुम्हें ज़्यादा नहीं बोलना चाहिए।”—उसने कहा।

“मुझे बड़ा हल्का-सा लग रहा है।”—उसने कहा।

“डॉक्टर ने तुमसे कुछ कहा था?”

“नहीं… लेकिन एक महीना पहले आ जाती, तो इतनी कमज़ोरी नहीं होती।”

“तुम्हें काफ़ी कमज़ोरी महसूस हो रही है?”—उसने पूछा।

“नहीं, मुझे बड़ा हल्का-सा लग रहा है।”

“मैंने तुमसे पहले भी जल्दी आने के लिए कहा था। लेकिन तुम टालती रहीं।”

“तुम हर बात पहले से ही ठीक कहते हो।”—उसने कहा।

वह चुप रहा और दूसरी ओर देखने लगा।

“तुमने बुरा मान लिया?”—वह कुहनी के सहारे बैठकर उसकी ओर देखने लगी।

“नहीं, लेकिन तुम्हें ज़्यादा नहीं बोलना चाहिए।”—उसने उसके बालों को सहलाते हुए कहा।

“देखो… अब कोई फ़िक्र नहीं है” —उसने कहा— “अब मैं ठीक हूँ।”

“लेकिन तुम अब भी उसके बारे में सोचती हो।”—उसने कहा।

“मैं किसी के बारे में नहीं सोचती।”—उसने कहा। फिर उसने उसके कोट के बटन खोल दिए।

“तुमने स्वेटर नहीं पहना?”—उसने पूछा।

“आज ज़्यादा सरदी नहीं थी।”—उसने कहा। वे कुछ देर तक चुप रहे। बीच में नर्स आयी थी। वह ब्लॉन्ड थी और देखने में काफ़ी ख़ुशमिज़ाज-सी जान पड़ती थी। उसने उन दोनों को देखा फिर वह बिस्तर के पास चली आयी।

“तुम्हें अभी इस तरह नहीं बैठना चाहिए।”—नर्स ने उसका सिर तकिए पर टिका दिया। फिर उसने एक नज़र उसकी ओर देखा।

“इन पर ज़्यादा स्ट्रेन डालना ठीक नहीं होगा।”

“मैं कुछ देर में चला जाऊँगा।”—उसने कहा।

नर्स ने बिस्तर पर बिखरी चीज़ों को देखा, वह उसकी ओर मुड़ी और मुस्करा दी— “आपको भविष्य में सावधान रहना चाहिए।” —उसने कहा। उसके स्वर में हल्का-सा मज़ाक़ था। वह चुप रहा और दूसरी ओर देखने लगा। जाते हुए वह ठहर गई।

“तुम्हारे पास रूई काफ़ी है?”—उसने पूछा।

“हाँ, धन्यवाद सिस्टर।”—उसने कहा। नर्स बाहर चली गई।

“तुम ज़रा दूसरी तरफ़ मुड़ जाओ।”—उसने धीरे से कहा। वह तकिए के नीचे से कुछ निकाल रही थी।

“मैं बाहर चला जाता हूँ।”—उसने कहा।

“नहीं, उसकी कोई ज़रूरत नहीं। सिर्फ़ अपना सिर मोड़ लो।”

वह पीछे दीवार की ओर देखने लगा। उसे बहुत पहले की रातें याद हो आयीं, जब वह उसके कमरे में बिस्तर से उठकर कपड़े पहनती थी और वह दीवार की ओर मुँह मोड़कर उसके स्कर्ट की सरसराहट सुनता रहता था।

“बस… ठीक है।”—उसने कहा।

उसने स्टूल मोड़कर उसके सिरहाने के पास खिसका दिया। हवा में हल्की-सी गन्ध थी, जो क्लोरोफ़ॉर्म की गन्ध से अलग जान पड़ती थी। उसकी आँखें अनायास पलंग के नीचे चिलमची पर पड़ गई—उसमें ख़ून में रंगी बहुत-सी पट्टियाँ पड़ी थीं। यह ख़ून उसका हो सकता है, उसे विश्वास नहीं हो सका।

“क्या तुम्हें अब भी…” वह बीच में रुक गया।

“नहीं… अब बहुत कम आ रहा है।”

उसने झुककर चिलमची को पलंग के नीचे खिसका दिया।

“तुम्हारे पास सिगरेटें हैं?”—उसने पूछा। वह फिर लेट गई।

उसने लीपा की डिब्बी से दो सिगरेटें निकालकर मुँह में रख लीं। दोनों को दियासलाई से जलाया और उनमें से एक उसे दे दी।

“तुम यहाँ सिगरेट पी सकती हो?”

“नहीं… लेकिन कोई देखता नहीं”—उसने एक लम्बा गहरा कश लिया। धुआँ बाहर निकलते समय उसके नथूने धीरे से काँप रहे थे। फिर उसने उसे चिलमची में फेंक दिया।

“मैं पी नहीं सकती।”—एक पतली कमज़ोर-सी मुस्कराहट उसके होंठों पर सिमट आयी। उसने चिलमची से सिगरेट निकालकर बुझा दी। सिगरेट के एक सिरे पर उसकी लिपिस्टिक का निशान जमा रह गया था।

“तुम अब एक पनीर लोगी?”

“नहीं… तुम्हें अब जाना चाहिए।”

“मैं चला जाऊँगा, अभी समय है।”

उसने अपनी आँखें मूँद ली थीं। लम्बी, भूरी पलकें उसके पीले चेहरे पर मोम की गुड़िया की पलकों-सी दिखायी दे रही थीं।

“तुम्हें क्या नींद आ रही है?”—उसने धीमे स्वर में पूछा।

“नहीं…” उसने आँखें खोल दीं। उसका हाथ अपने हाथ में लेकर वह उसे धीरे-धीरे मसलने लगी।

“मैंने सोचा था, तुम आओगे।”—उसने कहा।

वह चुपचाप उसे देखता रहा।

“सुनो… अब हम पहले की तरह रह सकेंगे।”—उसके स्वर में हल्का-सा विस्मय था।

“तुम्हें याद है…” —उसने उसका हाथ दबाकर कहा— “पिछली गर्मियों में हम इटली जाना चाहते थे… अब हम वहाँ जा सकते हैं।”

“अब हम कहीं भी जा सकते हैं” —उसने उसकी ओर देखा— “अब कोई झंझट नहीं है।”

उसे फिर उसका स्वर कुछ अजीब-सा लगा, लेकिन वह मुस्करा रही थी और तब उसका मन फिर आश्वस्त हो गया।

कॉरीडोर में ह्वील-चेयर के पहियों की चरमराहट सुनायी दी थी… पास के क्यूबिकल में कोई ऊँचे स्वर में चीख़ रहा था। किसी स्त्री ने परदा उठाकर भीतर झाँका था, लेकिन उसे वहाँ बैठा देखकर वह हड़बड़ाकर वापस मुड़ गई थी।

उसने घड़ी देखी और फिर वह ओवरकोट पहनने लगा।

“तुम्हें ये चीज़ें खा लेनी होंगी”—उसने अंग्रेज़ी में कहा।

उसने सिर हिलाया।

“तुम समझीं, जो मैंने कहा?”

“तुमने कहा, तुम्हें ये चीज़े खानी होंगी”—उसने अंग्रेज़ी में उसका वाक्य दुहरा दिया। वे धीरे से हँस पड़े।

उसने अपना मफ़लर गले में बाँध लिया। ख़ाली डफ़ल बैग को कन्धे पर लटकाकर वह स्टूल से उठ खड़ा हुआ— “तुम अब जाओगे?”

“हाँ, लेकिन कल मैं इसी वक़्त आऊँगा।” —उसने कहा। वह अपलक उसकी ओर देखती रही— “इधर आओ।” —उसने कहा।

वह सिरहाने के पास झुका। उसने अपनी देह से चादर हटा दी और दोनों हाथों से उसका चेहरा अपने वक्ष पर खींच लिया।

“कोई आ जाएगा।”—उसने धीरे से कहा।

“आ जाने दो।”—उसने कहा।

कुछ देर बाद जब वह बाहर आया, वसन्त की रात झुक आयी थी। हवा में धरती की सोंधी-सी गन्ध का आभास था। उसने निश्चिन्त होकर ठण्डी-ताज़ी हवा में साँस ली। अस्पताल के उस तंग, ज़रूरत से ज़्यादा गर्म क्यूबिकल के बाद उसे बाहर का खुलापन बहुत सुखद प्रतीत हो रहा था। उसने घड़ी देखी। अभी दस मिनट बाक़ी थे। उसे हल्की-सी ख़ुशी हुई कि वह प्राग जाने से पहले एक बिअर पी सकेगा।

कुछ देर तक वह पलंग पर आँखें मूँदे लेटी रही। जब उसे निश्चय हो गया कि वह अस्पताल से दूर जा चुका है, तो वह धीरे से उठी। खिड़की खोल दी। बाहर अँधेरे में उस छोटे-से शहर की बत्तियाँ जगमगा रही थीं। उसे प्राग में अपने होस्टल का कमरा याद हो आया। वह सिर्फ़ दो दिन पहले उसे छोड़कर आयी थी। लेकिन उसे लग रहा था, जैसे तब से एक लम्बी मुद्दत गुज़र गई है। वह कुछ देर तक वहीं निश्चल खड़ी रही। मैटर्निटी वार्ड से किसी बच्चे के रिरियाने की आवाज़ सुनायी दी थी, फिर सब ख़ामोश हो गया।

वह चुपचाप बिस्तर के पास चली आयी। अपने सूटकेस से एक पुराना तौलिया निकाला। फिर उसने क़रीने से उन सब चीज़ों को लपेटा, जो वह उसके लिए छोड़ गया था। खिड़की के पास आकर उसने उन्हें बाहर अँधेरे में फेंक दिया।

जब वह वापस अपने बिस्तर के पास आयी, तो उसका सिर चकराने लगा। स्टूल पर लीपा का पैकेट अब भी पड़ा था। उसने एक सिगरेट सुलगायी, लेकिन उसे उसका स्वाद फिर अजीब-सा लगा। उसे फ़र्श पर बुझाकर वह पलंग पर लेट गई। एक छोटा-सा गरम आँसू उसकी आँखों बहता हुआ उसके बालों में खो गया, किन्तु पता नहीं चला। वह आराम से सो रही थी।

निर्मल वर्मा की कहानी 'धूप का एक टुकड़ा'

Book by Nirmal Verma:

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निर्मल वर्मा
निर्मल वर्मा (३ अप्रैल १९२९- २५ अक्तूबर २००५) हिन्दी के आधुनिक कथाकारों में एक मूर्धन्य कथाकार और पत्रकार थे। शिमला में जन्मे निर्मल वर्मा को मूर्तिदेवी पुरस्कार (१९९५), साहित्य अकादमी पुरस्कार (१९८५) उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। परिंदे (१९५८) से प्रसिद्धि पाने वाले निर्मल वर्मा की कहानियां अभिव्यक्ति और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ समझी जाती हैं।