प्रिय मिलन की उत्कण्ठा में
दौड़कर पहाड़ लाँघ गयी थी प्रिया,
आपादमस्तक स्वेद से सनी हुई
जब प्रियतम के गले लगी
तब स्वेद की नैसर्गिक गन्ध से
सुवासित हो उठा प्रिय का अन्तर्मन

प्रिय ने अधरों से सोख लेना चाहा
प्रिया के माथे का स्वेद
और स्वेद तले छिपी तमाम पीड़ा,
आगे बढ़ थाम लिया प्रिया का मस्तक,
प्रिय के अधरों पर ठहर गयी
स्वेद की बूँदों की मिठास

स्वेद के मीठेपन से अपरिचित था प्रिय
चकित हो उसने देखा प्रिया का मुख
तमाम यत्नों के बाद भी नहीं समझ पाया
बन्द आँखों वाली प्रिया की जादूगरी

प्रिया ने नहीं खोलीं आँखें
उसने सम्भाल रखा था पलकों के पीछे
पीड़ा का हहराता सागर
अनगिनत दिवस रात्रियों की व्याकुल प्रतीक्षा
अनचाहे सवालों की चुभन

समझ गया था प्रिय
कि सम्पूर्ण अस्तित्व में मिठास भर
मिलने आयी है प्रिया
अकारण नहीं है स्वेद में भी मधुरता

आगे बढ़ रख दिए अधर
अधरों के मध्य काँप उठीं प्रिया की पलकें
टूट गया सागर में बंधा बाँध
खुल गया छिपे दर्द के निकलने का मार्ग

प्रिय ने अधरों में जज़्ब होती बूँदों से जाना
कि स्वेद और अश्रु के नमक में है फ़र्क

प्रिय के लिए बहाया स्वेद होता है मधुर
जबकि
समय, समाज और कातर पीड़ा से उपजे
अश्रुओं के नमक में होती है तिक्तता,
उसके स्वाद में होता है तेज़ाबी खारापन।

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