बस्ती की हर चीख़
खरोंच देती है मेरी चेतना को,
चींटियों के शोकगीत अब भी
मेरी नींद के विन्यास को बाधित करते हैं।
ईराक़ में फटने वाले हर बम से
थर्रा जाती हैं मेरी शिराएँ।

सुखों के मलिन नोट नहीं दबाता मैं बिस्तर तले,
छुपा लेता हूँ खनकते दुःखों के सिक्कों की आवाज़।
मेरी उपस्थिति या परछाईं नहीं बनती
किसी के भय का कारण,
सम्भव है मेरे प्रेम का व्याकरण दोषपूर्ण हो
किन्तु ठीक से घृणा करना भी तो नहीं आया मुझे।

नहीं सीखा मैंने किसी को जानना
उसकी चमड़ी के रंग से,
नहीं पहचाना किसी को
सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज उसकी जाति से।
दीवाली के शोर में भी मेरे भीतर तैर जाता है
दीये बेंचते मासूमों का तैलाक्त चेहरा।

उगते पौधे में मुझे नज़र आता है अपना ही चेहरा,
जलते जंगलों की आँच से पिघलता हूँ मैं।
मैंने काले को नहीं पढ़ा सफ़ेद
और दो दूनी चार की भाषा से सहमत भी न हो पाया।
मेरी मनुष्यता के पक्ष में मेरी यही गवाही है।

हाँ, काजल की कोठरी में
कुछ कालिख मेरे चेहरे पे आयी हो, सम्भव है,
सम्भव है कि मेरे पाँव तले अनजाने ही
दब गयी हों कई चींटियाँ,
सम्भव है, मैंने भाषा से ले लिया हो कभी अस्त्र का काम,
हाँ मेरी चादर कुछ मैली हो सकती है;
लेकिन अपनी सीमित इर्ष्याओं के बावजूद,
मैंने नहीं बनाए किसी के लिए षड्यंत्रों के लाक्षागृह।
और इसलिए मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ
कि कुल के बावजूद बेचेहरा भीड़ में
मैं औसत से थोड़ा अधिक आदमी हूँ।