‘Badalti Prarthnaaein’, a poem by Ruchi

जाते वक़्त मैं मिली थी
उस पुराने मंदिर से
जहाँ बड़ी ख़्वाहिशों की गुहार की थी
कभी भैय्या की शादी पक्की करा दो
कभी परीक्षा में पास करा दो
कभी सहेली की शादी रुकवा दो
तो किसी को उसका प्यार मिलवा दो।

चढ़ाए गए थे फूल बड़ी आस्थाओं से जहाँ
उकेरे गए थे कितने ही जोड़ों के नाम वहाँ
मैं मन्दिर की दीवारों पर लिखने के सख़्त ख़िलाफ़ थी
पर मन ही मन सच्चे दिल मिल जाएँ, बस यह ही दुआ थी।
कितनी जोड़ी शरमाती हुई नज़रें मिलीं
मन्दिर के नलों और घण्टियों पर स्पर्श महसूस किए गए।
उकेरे गए नामों पर हाथ फिराया गया
बड़ी श्रद्धा से पूजा का टीका सर सजाया गया।

वक़्त मन्दिर से विदा का था
मूँदकर आँखें, प्रार्थना की,
जो बेहतर हो हम सबके लिए वही मिले,
कुछ नहीं चाहा कभी कुछ ज़रूरत से ज़्यादा।

बैठी मन्दिर की पिछली दीवार से लगकर
सोचा ऐ काश कि समन्दर खींच लाती
इन नवेले प्रेमी जोड़ों के लिए।
उकेरते मिटाते रेत पर एक दूजे का नाम
ऐसा कबूतर हो जाती जो झट पहुँचा देता पैगाम
तभी एक नाम अपना भी देखा
जिसके साथ जुड़े नाम को काटकर
की गयी थी कोशिश दूसरा नाम जोड़ने की।

हर सोमवार को जाँचा कौन-सा नाम पक्का हुआ
और अन्त में पाट दिया गया मेरा नाम सिन्दूरी रंग से।
तब मैं सोचती ऐ काश, मैं दो हो जाती
या आधी अल्हड़ बनारस में तो
आधी भागती दिल्ली में रह जाती।

भूलने लगी मैं वो प्रार्थनाएँ जो मन्दिर में की थीं
नयी प्रार्थनाओं ने जगह ली
कभी छूटे माँ बाप के लिए
कभी नये मिले माँ बाप के लिए
झुकने लगे सर प्रार्थनाओं में।
कभी पति का काम अच्छा हो
कभी बच्चों का जुकाम अच्छा हो।

नाम ने भी सुरक्षा पा ली थी
जुड़ने की बस एक नाम से।
बैठने लगी थी टिककर अब रसोई की दीवार से
अब जी चाहता पक्षी बन उड़
आती अपने पुराने मकान पर।
जज़्ब कर लेती हूँ एक समन्दर,
आँख और ज़ुबान पर।

नयी ख़्वाहिशों के फूल अब उगने लगे हैं
पुरानी इच्छाओं के पर अब झड़ने लगे हैं
उकेर दिए कई जज़्बात मुट्ठी भर आसमान पर,
पाट दिए कई मन वक़्त की पुकार पर।

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