उसने शायद खाना नहीं खाया था।
रोज़ तो सो जाता था
दुबक के
फैल के
रेल प्लेटफ़ॉर्म पे
बेंच के नीचे।
क्यों सता रहा है आज उसे
बारिश का शोर
गीली चड्ढी और ज़मीन का चिपकना
यात्री-जूतों से झड़ी, सड़ी मिट्टी की बदबू
और बरसाती कीड़े?
सोया तो वह बिना बेंच की छत के भी है
ओले पड़ रहे थे जब
नंगा—
फ़क़त पन्नी ओढ़ के।
आज सारा दिन कचरा जमा किया
चुन चुन के बियर की जूठी बोतलें, टीन के कैन
काँच के बेकार ग्लास
गन्दी काँच की चौंधियायी आँख से
उसे धुंधली धुंधली दिखती सतत्तर गलियों से,
और सेठ बोलता है
पैसे परसों ले जाना
सोमवार को!
निम्ला को कुल्फी खिलाने के वादे का क्या हुआ?
ढाबे पे इसका दोस्त बिरजू
आज न था, जाने कहाँ गया
और मालिक बहादुर ने
अपने ढाई रुपे के चावल
जो नमक साथ माँग के रोज़ खा लेता था
उधारी न दिए।
सोच रहा था
आज तो भूख इतनी नहीं है
कल क्या करेगा,
कचरे का सेठ चोपड़ा भी मक्खी चूस साला
सात रुपे देने में माँ मरती थी साले की।
अपनी उंगलियों की बदबूदार लकीरों पे
गिनना किया शुरू
…नींद तो आती नहीं थी…
रोज़ का हिसाब
कितना कमा लिया इस पिछले साल?
बहुत पास आँख के लाता उँगली
तो लकीरें धुंधली हो जातीं
दूर करने लगा
तो बेंच के लोहे से टकरा गया हाथ।
नीचे पीप-सी चिपचिपी ज़मीन
और पीठ पे रेंगता एकल केंचुआ,
आज पन्नी भी लाना रह गया साला
सोचा था आज तो निम्ला की खाट पे सोऊँगा।
निम्ला का पति चौकीदारी करता था
सोता था गेट पे कुर्सी जमा के
अंडर कंस्ट्रक्शन बिल्डिंगों की,
अंदर सबसे ऊँचे माले पर
लगती थी निम्ला की खाट
पिछले ऐत को अठारहवें पे थी, आज इक्कीसवें;
निम्ला के तीन माले दो हफ़्ते में बढ़ गए थे
और बंटू के पर-बोतल के दस पैसे साल में।
गिनने लगा फिर से,
अंडर बेंच माले पे आके
करवट बदल के क़त्ल केंचुए का करके,
अपनी साल-भर की कमाई
हफ़्ता-हफ़्ता पीछे जा के।
यह सात आज के
पर इसे कैसे गिन लूँ
ये तो मिले ई नईं अभी
कल के चार
परसों के पौने दू
बुद्ध के पाँच
मंगल के सवा आठ
(शनि सोम मंगल मिला के)
और पिछले शुक्कर के…
…भोर तक यों ही गिनता रहा
सत्रह बरस का
अपने क़स्बे के
हाशिआई इलाक़े से भागा
बंटू भंगी
अपनी एक बरस की कमाई
जो जेब में थी न बही में किसी।
रविवार के रवि की
पहली किरन पे
हुआ खुलासा
टर्न ओवर का,
लिख दिया बंटू ने
बेंच के नीचे
चूतड़ों से सुखायी
प्लेटफ़ॉर्म की ज़मीन पर
टूटे हुए कंचे की तीखी नोक से
सर को पीछे बेंच से एकदम सटा के
(ज़्यादा नज़दीक या दूर से उसको दिखता न था)
(परसों के सात मिला के)
दू हजार पिचामबे।

दो हज़ार पचानवे
मैं इतने का ही आज चश्मा ख़रीद लाया हूँ।

सहज अज़ीज़ की नज़्म 'नींद क्यों रात-भर नहीं आती'

Recommended Book:

Previous articleलकड़ी की आह
Next articleअरविन्द यादव की कविताएँ
सहज अज़ीज़
नज़्मों, अफ़सानों, फ़िल्मों में सच को तलाशता बशर। कला से मुहब्बत करने वाला एक छोटा सा कलाकार।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here