उमर ख़ालिद के नाम

बढ़ई का काठ कुरेदना
कड़घच्च कड़घच्च कड़घच्च
ऐसी तो आवाज़ नहीं करता
पर करता है जैसी भी
उसका सीधा नाता है
लकड़हारे के बीच जंगल में
अकेले में आते ख़्यालों से
और कट्ट कट्ट कट्ट जैसी
जो भी है पेड़ काटने की
आवाज़ से
साथ ही फ़ह्हश फ़ह्हश
पॉलिश की (नकली) आवाज़ से
और कुर्सी पर बैठे
साहिब, आलिम या फ़ाज़िल
के हिलने से आती
चर चर्रर्र आवाज़ का
उन्हीं के मुँह से निकली
आह हय्ये हाए से।

ऐसे में जब करता है कारकून कोई
इंक़लाबो इंक़लाबो इंक़लाबो इंक़लाबो
ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद
का नारा बुलन्द
और उसको पड़ती है
थाने में एक अरसे से इंतज़ार में पड़ी
क़ानून को अपना और अपने को
क़ानून का सर्वोच्च न्यायालय मानने वाली
लकड़ी की पुलिस की लकड़ी की लाठी
जो बाद में ढूँढती है
कारावास का एकान्त और कोई असंतुलित मौक़ा
किसी इंक़लाबी की गुदा में घुस जाने का
तो सारी दुनिया की
आह आह आह आह
की आवाज़ें
क्या एक-समान चांद तक जाती हैं?
क्या सभी के लिए तारों से दुआ आती है?
ऐ नबी क्या सभी की
कभी भी सुबह आती है?

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सहज अज़ीज़
नज़्मों, अफ़सानों, फ़िल्मों में सच को तलाशता बशर। कला से मुहब्बत करने वाला एक छोटा सा कलाकार।

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