जैसे पागलों के सींग नहीं होते
ऐसे ही आज़ादों के पंख नहीं होते

पर देखा जाए
(ग़ौर से)
तो होते हैं
रंग स्वादों के
पेट भ्रष्टों के
जूते रईसों के
चीथड़े मुफ़लिसों के
काँटे फूलों के
डंक साँपों के
अंक नापों के
जाल बातों के
लश्कर, सरहदें, युद्ध और
शांति के वादे पतित लीडरों के
और सींग पागलों के

हाँ होते तो हैं
हाथ ममता के
आँखें बापता की
होंठ प्यारे के
छड़ी मास्टरी की
अब्बी दोस्ती की
कट्टी झगड़ों की
बंटे नानी के बचपन नानी का
खट्टी निमोलियाँ स्कूल के पेड़ों की
संग भी मील भी रास्तों के
दर्द मंज़िल के
उदासी, बेकारी, उक्ताहट और
मुबाहिसे ज़हीनों के
इरादे, कोशिशें, जहद और
घाव इंक़लाबियों के
और सींग पागलों के
पंख आज़ादों के!

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सहज अज़ीज़
नज़्मों, अफ़सानों, फ़िल्मों में सच को तलाशता बशर। कला से मुहब्बत करने वाला एक छोटा सा कलाकार।

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