अकेली औरत
पीछे लौटती है
बीसियों साल पहले के मौसम में
जब वह अकेली नहीं थी
सुबह से फिरकनी की तरह
घर में घूमने लगती थी
इसके लिए जूस
उसके लिए शहद नींबू
पलँग पर पड़ी बीमार सास
तिपाई पर रखी उसकी दवाइयाँ
साहब के कपड़े
बच्चों के यूनीफ़ॉर्म
उसके चेहरे पर जितनी भी शिकन आए
साहब और बच्चों के कपड़ों पर
कोई शिकन नहीं रहनी चाहिए

हर पल रहती चाक-चौबंद
दोपहर का सेहतमंद खाना
सबको समय पर
इसके लिए भरवाँ भिंडी
उसके लिए बैंगन का भुरता
एक दाल सादी-सी…
पराँठे के साथ खुश्क चपाती भी
घर क्या किसी होटल से कम है
जितने सदस्य
उतनी तरह का खाना…
और वह ख़ुशी से फूल उठती
उसका घर है कि ख़ुशियों का ख़ज़ाना

लेकिन समय तो समय है
हर दिन बदलता है
इंसान ठहरा रह जाए
समय कहाँ ठहरता है…

बीमार सास अपना चोला उतार गई
अपनी मंजी ख़ाली कर गई
साहब का ओहदा बढ़ा
नौकरी पर लगे बच्चे
उसके लिए रह गईं
बस वे दीवारें
जिनके पलस्तर थे कच्चे

और दीवारों पर टंगे कैलेंडर
कैलेंडर पर बैठी तारीख़ें
तारीख़ों के बीच जमी बैठी वह!
दस को आएँगे साहब
कल ही तो गए हैं…
अब नौ दिन रह गए
अब आठ
अब सात
अब दो दिन
अब एक…
साहब के लौटने की तैयारी में
घर ‘घर’ जैसा हो जाता…
ख़ूबसूरत गुलदस्तों में
फूल महकने लगते
तहाकर रखा गया ग़लीचा
फ़र्श पर बिछकर निखर आता
काग़ज़ क़रीने से रखे जाते
लाल गोले से घिरी तारीख़ को
अँधेरे में एक रोशनी की तरह
पास आते देखते
दस दिन जैसे-तैसे कट जाते…

एक दिन लौटे साहब
किया ऐलान
अब उनके साथ है—
एक बीस साल छोटी औरत
अब जाकर उन्हें
‘कम्पैटिबिलिटी’ की हुई पहचान!
वह फटी आँखों से ताकती रह गई
तो वह फट पड़े—
उन्हें ‘साथ’ चाहिए था
एक जोड़ी हाथ नहीं
जो बस सारा समय
शर्ट और टाई समेटे
बनाए भरवाँ भिंडी और करेले
वह कैसे मुक़ाबला करती
इस बीस साल छोटे नये मेहमान का
अब उसने समझा और जाना
आख़िर इतने साल बाद
अपने को अब पहचाना!
जिसे अपनी ज़िन्दगी-भर की कमाई
अपनी धरोहर समझती आयी थी
वह तो कब की
हाथ से फिसल चुकी थी
उसकी जान तो अब तक
करेले और भिंडी में ही बसती थी
जो अब फ़्रिज के निचले शेल्फ़ में
पड़े-पड़े सूख जाती हैं
और आख़िर डस्टबिन के काम आती हैं

इस बीच बीते कई साल
वह सब्ज़ियों को आते
और सूखते देखती रही
सब्ज़ियाँ अड़ियल थीं या वह
पर हलक से नीचे उतरने से
सब्ज़ियाँ इंकार करती रहीं

अब वह औरत
आधी सदी पहले के मौसम में
और पीछे लौटती है
जब वह अकेली थी
पर उसके साथ थे
छोटे और बड़े कैनवस
रंग और कूची!

रचती थी वह—
चहचहाते पक्षी
उगता और ढलता सूरज
हरे-भरे पेड़-पौधे और फूल गुलाबी
हरहराता समंदर और
पछाड़ खातीं लहरें
नीला आसमान और चमकते तारे
इन पचास सालों में
सारे के सारे
कहीं खो गए थे बेचारे!

सूखकर अकड़ गए थे
कूची के रेशे
और कैनवास का
कपड़ा गया था तड़क!

उसने हार नहीं मानी
अपनी उँगलियों को फिर से
थमायी कूची
पर उँगलियाँ नहीं आँक आयीं
हरे-भरे पेड़-पौधे और फूल गुलाबी
हरहराता समंदर और
पछाड़ खातीं लहरें
नीला आसमान और चमकते तारे
अब उँगलियों ने
कैनवस पर आँके
दिमाग में उठते
अंधड़ के रेले
उतने ही प्यार से
जितने प्यार से बनाती थीं वे
भरवाँ भिंडी और करेले!

उन आड़ी-तिरछी लकीरों को
उस अंधड़ को
सिर में उठते बवंडर को
अपनी क़ैद से आज़ाद कर
पहले कैनवास पर बिखेरा…
फिर गैलरी की दीवारों पर
घेर ली उसने आधी दुनिया
और पूरा आसमान
उसकी उँगलियों की करामात
पहुँची पेरिस, पहुँची जापान!
सराहना से अँटे अख़बार
लद फँद गई मेडल और ट्रॉफ़ियों से
कमरे के रैक में भर गए
पुरस्कार और सम्मान

दिन में टी वी चैनलों को
इंटरव्यू देती वह अकेली औरत…
सफलताओं के छपे सतरंगी टुकड़ों के साथ
अपने को अकेला छोड़कर
चुपचाप उठती है…
रात को अब भी आहिस्ता से
फ़्रिज खोलती है और
अपनी आँख बचाकर
सूखते भिंडी और करेलों को
हसरत से ताकती है…

सुधा अरोड़ा की कविता 'धूप तो कब की जा चुकी है'

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