‘Bhasha Ka Newton’, a poem by Prem Prakash

भाषा के न्यूटन ने जब लिखा होगा
संधि-विच्छेद का नियम
तब पैदा नहीं हुए होंगे चाणक्य
न ही होती होगी
राज्यों के बीच संधि
न होती होंगी शिखर वार्ताएँ
न बनाता होगा कोई बढ़ई गोलमेज़
तब बकरी की भाषा बोलने का
नहीं करता होगी कोई लोमड़ी रियाज़
तब शरणार्थी
ख़ैराती शामियाने के नीचे सिर छिपाने के लिए
नहीं करते होंगे फ़रियाद
भाषा के न्यूटन ने
जब देखा होगा पहली बार दूरबीन से
भाषा में समास को
तब नहीं बने होंगे ब्राण्ड
न करती होंगी लड़कियाँ कैटवॉक
नये लिंग निर्णय के साथ
रेहड़ी-पटरी पर बैठा प्रत्यय
आज जुमलों की अट्टालिकाएँ देखकर
भाषा के न्यूटन को कोसता है,
भाषा भी एक कूटनीति है
रात को अपनी रोटी
पत्नी की थाली में रखकर सोचता है!

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