भ्रमित रहना चाहती हूँ

‘Bhramit Rehna Chahti Hoon’, a poem by Pallavi Vinod

कोई ख़ुद पर मोहित कैसे हो सकता है?

क्यों नहीं! प्रकृति भी तो ख़ुद पर मोहित है,
अपने पहाड़ों से चूमती है नदियों के कपाल,
नदियाँ, जाने कितने भू खण्डों को
आलिंगन में भर, प्रेम प्रदर्शित करती हैं,
मृदा, पुष्पों को जन्म देकर कंटकों से उनकी बलैयां लेती है,
भ्रमर, फूल के आस्वादन से झूमते-गुनगुनाते हैं,
लहरें भर देती हैं रेत को शृंगार के सौंदर्य से और
अम्बुज, जलधि के साथ साहचर्य का वचन निभाते हैं।

लेकिन ये तो प्रकृति के घटक हैं! इसमें प्रकृति का
ख़ुद को प्यार करने जैसा क्या है?

ये घटक ही तो एक-दूसरे को सम्पूर्ण कर रहे हैं,
एक-दूसरे के आलिंगन में,
जैसे मेरी आँखें तुम्हें बिना छुए चूम लेती हैं।
हथेलियाँ तुम्हारे कोमल स्पर्श से
अपनी कठोरता तज निखर जाती हैं,
मेरे होठ तुम्हारी बातों पर मुस्कुराते कितने सुन्दर हो जाते हैं।
और मेरा हृदय जिसका स्पंदन
तुम्हारी मासूमियत से मचल जाता है
कैसे न मोहित हूँ इस रूप पर!
जिसके चेहरे को हर महफ़िल में तुम्हारी आँखें ढूँढा करती हैं।

और मैं तुम्हारी बातों के सम्मोहन में
जीवन भर भ्रमित रहना चाहती हूँ।