‘लोकप्रिय आदिवासी कविताएँ’ से

अभी-अभी
सुन्न हुई उसकी देह से
बिजली की लपलपाती कौंध निकली
जेल की दीवार लाँघती
तीर की तरह जंगलों में पहुँची
एक-एक दरख़्त, बेल, झुरमुट
पहाड़, नदी, झरना
वन प्राणी-पखेरू, कीट, सरीसृप
खेत-खलिहान, बस्ती
वहाँ की हवा, धूल, ज़मीन में समा गई…
एक अनहद नाद गूँजा—
“मैं केवल देह नहीं
मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ
पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं
मैं भी मर नहीं सकता
मुझे कोई भी
जंगलों से बेदख़ल नहीं कर सकता
उलगुलान!
उलगुलान!!
उलगुलान!!!”

जंगल की धरती की बाईं भुजा फड़की
हरे पत्तों में सरसराहट…
सूखों में खड़खड़ाहट…
फिर मौन हो गया
कुछ देर के लिए सारा अँचल
खेलने-कूदने की उम्र में
लोगों का आबा बन गया था वह
दिकुओं के ख़िलाफ़
बाँस की तरह फूटा था धरती से
जैसे उसी पल गरजा हो आकाश
और
काँपे हों सिंहों के अयाल

नौ जून, सन्… उन्नीस सौ
सुबह नौ बजे—
वह राँची की आतताई जेल
जल्लादों का बर्बर खेल
अंततः…
बिरसा की शांत देह!

“क्या किया जाए इसका?”
हैरान थे,
दिकुओं के ताक़तवर नुमाइंदे
ज़िंदा रहा ख़तरनाक बनकर
मार दिया तो
और भी भयानक

अगर दफ़नाया तो धरती हिलेगी
जो जलाया—आँधी चलेगी

वह मुंडारी पहाड़ों सी काली काया
नसें, जैसे नीले पानी से लबालब ख़ामोश नदियाँ
उभरे पठार सी चौड़ी छाती
पथराई आँखें—
जैसे अभी-अभी दहकते अंगारों पर
भारी हिमखंड रख दिए हों
कुछ देर पहले ही तो हुई थी ख़ून की क़ै
जेल कोठरी के मनहूस फ़र्श पर
उसी के ताज़ा थक्के…
नहीं!
थक्के न कहें,
वे लग रहे थे—
हाल ही कुचले पलाश के फूल
या
खौलते लावा की थोड़ी सी बानगी

चेहरे पर
मुरझाई खाल की सलवटों की जगह
उभर आया एक खिंचाव
जैसे,
रेशा-रेशा मोरचाबंद हो
गिलोल की मानिंद
धनुष की कमान सी तनी मांसपेशियाँ
रोम-रोम जैसे—
तरकश में सुरक्षित
असंख्य तीरों की नोंक
गोया,
वह निस्पंद बिरसा न होकर
आज़ाद होने के लिए कसमसाता
समूचा जंगल हो
उन्हें इंतज़ार था
सूरज के डूब जाने का
दिन-भर के उजास को
वे छुपाते रहे सुनसान अंधी गुफा में
जिसके दूसरे छोर पर गहरी खाई
वहीं उन्होंने
बिरसा मुंडा से निजात पायी

कहते हैं—
काले साँप को मारकर गाड़ देने से
ख़त्म नहीं हो जाती यह सम्भावना कि
पुरवाई चले और वह जी उठे
यदि ऐसा हो तो
परिपक्व जीवन को
धरती अपने गर्भ में नहीं रखती
बिरसा
उनके लिए
साँप से ख़तरनाक था
वह दिकूभक्षी शेर था
और
वह भी अभी जवान
इसलिए
उसे दफ़नाया नहीं
जलाया था—रात के लिहाफ़ में छुपाकर
यह जानते हुए भी कि
दुनिया में ऐसी कोई आग नहीं जो
दूसरी आग को जलाकर राख कर दे

रात के बोझिल सन्नाटे ने स्वयं को कोसा
आकाश के सजग पहरेदारों की आँखें सुर्ख़ हुईं
हवा ने दौड़कर—
मुंडारी अँचल को हिम्मत बँधायी…
उन्होंने
आदमी समझकर बिरसा को मार दिया
मगर बिरसा आदमी से बढ़कर था
वह आबा
वह ‘भगवान्’
वह जंगल का दावेदार…

उसकी आवाज़
जंगलों में अभी भी गूँजती है—
“मैं केवल देह नहीं
मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ
पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं
मैं भी मर नहीं सकता
मुझे कोई भी
जंगलों से बेदख़ल नहीं कर सकता
उलगुलान!
उलगुलान!!
उलगुलान!!!”

हरिराम मीणा की कविता 'आदिवासी लड़की'

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हरिराम मीणा
सुपरिचित कवि व लेखक।

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