‘Bistar Par Phenki Haddiyaan’, a poem by Akshiptika Rattan

वो आज फिर आयी है
खण्डहर बने उस बिस्तर पर,
इश्क़ में भुनी चादर
सिमट गयी है सिरहाने की ओर,
बिस्तर पर फेंकी हड्डियाँ चीख़ने लगी हैं,
दीवारों के सलाभ में बसी माँस की गंध
फ़र्श पर बिखरे छिले हुए चिथड़े
पुकारकर ले आए हैं उसे
वो औरत आज फिर आयी है
बिस्तर पर फेंकी हड्डियाँ बटोरने
उसे पता चला है आज
वो मर्द औरत का माँस खाता है
हड्डियाँ फेंक जाता है बिस्तर पर
वो आज फिर आयी है
चुनने उन हड्डियों को
हड्डियों ने देखा है बेनूर होते इश्क़ को
हर हड्डी में दास्तान दफ़्न है उस इश्क़ की
वो दशकों में फैला इश्क़
हर हड्डी पर दाँतों के निशान गढ़े हैं
उस मर्द के दाँतों के निशान
जो माँस चबाने के लतीफ़े सुनाता है
वो औरत आज फिर आयी है
उन हड्डियों के क़रीब
बिस्तर का गद्दा सुन्न पड़ गया है
औरत की गर्दन की हड्डियाँ
कंधो की हड्डियाँ
भुजाओं की हड्डियाँ
छाती की हड्डियाँ
पीठ की हड्डियाँ
जांघों की हड्डियाँ
बिस्तर पर फेंकी हड्डियाँ
टुकड़ों में चखता है वो मर्द
चीरे हुए माँस से रिस्ते लहू को
और वो औरत…
अपने लहू में इश्क़ घोले
अपने लहू में ईमान घोले
इबादत कर रही होती है
वो औरत आज फिर आयी है
बिस्तर पर फेंकी हड्डियों को इकठ्ठा कर
अपनी झोली में समेटने
सिरहाने पर टिकी प्राचीन आँखें
जाने से इन्कार करती हैं
पूछती हैं उस औरत से
किस गंगा में है वो ताक़त
जो इन हड्डियों को जज़्ब कर ले
बिस्तर पर फेंकी हड्डियाँ
फूलों से सजाए जाने से मुंकिर हैं
बिस्तर पर फेंकी हड्डियाँ
कलश में समाए जाने से मुंकिर हैं
बिस्तर पर फेंकी हड्डियाँ
सुपुर्दे-ए-ख़ाक होने से मुंकिर हैं!

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