बाबासाहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर की किताब ‘हिन्दू धर्म की रिडल’ से किताब अंश | Book Excerpt from ‘Riddles in Hinduism’, a book by Babasaheb Dr. B. R. Ambedkar

प्रकाशक: सम्यक प्रकाशन

जो यह सोचते हैं कि प्रजातंत्र का अर्थ मात्र चुनाव कराना है, वे तीन ग़लतियाँ करते हैं।

पहली ग़लती तो यह है कि सरकार और समाज बिलकुल अलग-अलग हैं। दरअसल सरकार समाज से अलग नहीं है। सरकार अनेक ऐसी संस्थाओं में से है जो समाज में जन्म लेती हैं और सामूहिक सामाजिक जीवन के लिए उसे कुछ आवश्यक काम सौंपे जाते हैं।

दूसरी ग़लती वे यह करते हैं कि वे यह नहीं समझते कि सरकार किसी समाज के अन्तिम लक्ष्य, उद्देश्यों और आकाँक्षाओं का प्रतिबिम्ब होती है और यह तभी सम्भव है जब उस समाज की बुनियाद प्रजातांत्रिक हो जिसमें वह सरकार है। अगर समाज की संरचना प्रजातांत्रिक नहीं तो सरकार भी प्रजातांत्रिक नहीं हो सकती। जहाँ समाज शासक और शासित वर्गों में बँटा होगा, वहाँ सरकार निश्चित रूप से शासक वर्ग की होगी।

उनकी तीसरी ग़लती यह है कि वे यह भूल जाते हैं कि किसी सरकार का अच्छा या बुरा होना, प्रजातांत्रिक या अप्रजातांत्रिक होना, आमतौर से उसके प्रशासनतंत्र पर, विशेष रूप से उसकी प्रशासनिक सेवाओं पर, निर्भर करता है, जिसके ऊपर सरकार को कानून-व्यवस्था के पालन हेतु निर्भर रहना पड़ता है। यह सब उस सामाजिक वातावरण पर निर्भर है जिसमें प्रशासक पलता है। यदि सामाजिक परिवेश ही अप्रजातांत्रिक है तो सरकार भी अप्रजातांत्रिक ही होगी।

लोग एक और ग़लती करते हैं जो इस सोच के लिए ज़िम्मेदार है कि प्रजातंत्र के कार्य करने के लिए बस प्रजातांत्रिक क़िस्म की सरकार ही काफ़ी होती है। सत्ताधारी वर्ग के लोग अगर सत्ता का उपयोग सारे समाज या दलित वर्ग के लिए न करके अपने वर्ग के हित में करते हैं, तो वह अच्छी सरकार नहीं हो सकती।

कोई प्रजातांत्रिक सरकार भली प्रकार चल सकती है या नहीं, यह समाज के सदस्यों पर निर्भर करता है। यदि समाज के लोगों की मानसिकता प्रजातांत्रिक है तो प्रजातांत्रिक सरकार से अच्छे परिणामों की अपेक्षा की जा सकती है। अगर ऐसा नहीं है तो प्रजातांत्रिक सरकार आसानी से एक ख़तरनाक तरीक़े की सरकार हो सकती है। यदि किसी समाज के सदस्य जातियों या वर्गों में बँटे होंगे और एक-दूसरे से कोई मतलब नहीं रखेंगे और जहाँ प्रत्येक व्यक्ति की आस्था सबसे पहले उसके अपने वर्ग के प्रति होगी, वहाँ हर व्यक्ति जातिवादी या वर्गवादी बन जाएगा और अपने वर्ग के हितों को सबसे ऊपर रखकर चलेगा और कानून और न्याय को विकृत करके अपने अधिकारों का प्रयोग अपने वर्ग के हित-संवर्धन में करेगा और इस उद्देश्य से उन लोगों के प्रति जीवन के हर क्षेत्र में नियोजित रूप से भेदभाव बरतेगा, जो उसके वर्ग से सम्बद्ध नहीं हैं। ऐसे में प्रजातांत्रिक सरकार क्या कर लेगी?

जिस समाज में विभिन्न वर्गों के बीच संघर्ष होता है और समाज-विरोधी गतिविधियाँ और आक्रामक भावनाएँ पनपती हैं, वहाँ सरकार न्याय और निष्पक्षता से कार्य नहीं कर सकती। ऐसे समाज में सरकार अगर लोगों की है और लोगों द्वारा बनायी भी गई है, तब भी वह लोगों के लिए नहीं हो सकती। यह एक वर्ग की और एक वर्ग के लिए है। लोगों के लिए सरकार वही हो सकती है जहाँ प्रत्येक नागरिक का व्यवहार प्रजातांत्रिक है। इसका अर्थ है : जहाँ प्रत्येक नागरिक अन्य सभी नागरिकों को समान समझने के लिए तैयार है; उतनी ही स्वतंत्रता देने के लिए तैयार है जितनी वह स्वयं चाहता है। प्रजातांत्रिक मानसिकता से एक प्रजातांत्रिक समाज में व्यक्ति का समाजीकरण हो जाता है। प्रजातांत्रिक सरकारों का पतन आमतौर से इस कारण हुआ है कि जिस समाज के लिए वे बनीं, वह समाज ही प्रजातांत्रिक नहीं था।

खेद है कि इस बात को ठीक से समझा ही नहीं जाता कि अच्छी सरकार अपने समाज की मानसिक और नैतिक प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। प्रजातंत्र एक राजनीतिक तंत्र से आगे भी कुछ है। यह एक सामाजिक प्रणाली से भी बढ़कर है। यह मन की प्रवृत्ति है, सोचने का तरीक़ा है और जीवन-दर्शन है।

कुछ लोग प्रजातंत्र की बराबरी समानता और स्वतंत्रता से करते हैं। बेशक प्रजातंत्र का समानता और स्वतंत्रता से बहुत गहरा सरोकार है। परन्तु इससे भी महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि समानता और स्वतंत्रता कैसे सुरक्षित रह सकती है। कुछ व्यक्ति कह सकते हैं कि सरकार कानून, समानता और स्वतंत्रता की रक्षक होती है। यह सही जवाब नहीं है। समानता और स्वतंत्रता सहभावना से आती है। फ़्रांस की राज्यक्रांति के कर्णधारों ने उसे बंधुत्व कहा था। बंधुत्व अपने में सम्यक अभिव्यक्ति नहीं है। कुछ ने इसके लिए सही शब्द ‘मैत्री’ कहा है।

बंधुत्व के बिना स्वतंत्रता समानता को नष्ट कर देगी। और समानता स्वतंत्रता को समाप्त कर देगी। यदि प्रजातांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्रता समानता को और समानता स्वतंत्रता को नष्ट नहीं करती तो इसका अर्थ यही है कि वहाँ बंधुत्व है, सद्भावना है, क्योंकि स्वतंत्रता और समानता का आधार बंधुत्व ही है। इस तरह स्पष्ट है कि बंधुत्व प्रजातंत्र की जड़ है।

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भीमराव आम्बेडकर
भीमराव रामजी आम्बेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956), बाबासाहब आम्बेडकर नाम से लोकप्रिय, भारतीय बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे। उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और अछूतों (दलितों) से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मंत्री, भारतीय संविधान के जनक एवं भारत गणराज्य के निर्माता थे।