बैठ गयी है जनपथ की धूल
गंगा कुछ साफ़ हो गयी है
उसकी आँख में अब सूरज बिल्कुल साफ़ दिखने लगा है।
पेड़ों के पत्ते थोड़े और हरिया गए हैं
हो गयी है लाल, टहनी चैत की।
अरे गुलमोहर के मसृण लाल फूल ने
अभी तो शुरू की है चकल्लस
अमलतास के पीले मुलायम फूल से-
बस अभी तो बढ़ी हैं टहनियाँ
आहिस्ते-आहिस्ते… एक दूसरे से लिपट जाने को।
बस अभी तो बौराना शुरू हुए हैं आम
बस अभी-अभी तो खिली हैं मंजरियाँ
अभी-अभी तो थमा है मोटर का शोर
हाँ, अभी, बस अभी तुम्हारे कंकड़ की चोट से आहत
पोखर का पानी थिर हुआ है।
अभी-अभी तो निकली है
सद्य-प्रसूता गौरैया अपने घोंसले से
सालों बाद सहूलियत में सुनायी दी है
कोयल की मधुर कूक,
दिखी है सुग्गे की लाल चोंच
क्षितिज पर ढलती लाली की पृष्ठभूमि में।
भीगी डाल से अचानक उड़ गयी चिड़िया के पीछे
काँपती डाल का अलसाया-सा पानी
बस अभी तो छूटा है डाल से।
अभी-अभी तो समुद्री किनारों पर
अण्डे रखकर गए हैं कछुए।
एक श्वेत कबूतर आ बैठा है मुण्डेर पर
विश्व-शान्ति के मूर्तिमान रूप सरीखा।
पृथ्वी की कक्षा में घट गया है
सभ्यताओं की अन्तहीन महत्त्वाकांक्षा का मलबा,
और भरने लगा है धरती के लिहाफ़ का छेद।
बस अभी-अभी
अभी-अभी…
अभी-अभी…
लेकिन यह क्या
मेरी नींद खुलती है महीनों के पार
और डरता हूँ घर का दरवाज़ा खोलते हुए,
पता नहीं…
पता नहीं कि इस चेतावनी भरे सन्देश को
मेरी दुनिया के मनुष्यों ने ठीक से पढ़ा या नहीं।
पशु-पक्षियों को क़ैद करने वाला मनुष्य
ख़ुद पड़ा रहा क़ैद में
गिनता रहा मच्छरदानियों के छेद।
धरती, नभ और सागर को साधने वाला मनुष्य
बमुश्किल ख़ुद को साधता रहा
प्रकृति की एक करवट पर,
एक हल्की-सी उच्छ्वास पर।
यह सब बीत जाने के बाद
क्या वह फिर से निकल गया होगा
वैसा ही कृतघ्न, निरंकुश?
क्या वह फिर से फैल गया होगा
गली, मोहल्ले, मॉल, ऑफ़िस, सड़क, रेस्तराँ,
नदी, पहाड़, जंगल, स्टेशन, बस, ट्रेन, कार,
मन्दिर, मस्जिद, बारात और शराबख़ाने तक?
क्या उसने पक्षियों का आसमान फिर से छीन लिया होगा?
क्या उसने जंगलों को फिर से धराशायी कर दिया होगा?
क्या उसकी उद्दण्डता की धूल में
डूब गयी होगी धरती की शेष उम्र?
मैं डरता हूँ,
डरता हूँ दरवाज़ा खोलते हुए…
डरता हूँ पाँव दरवाज़े से बाहर रखने में।