धुँध

‘Dhundh’, poetry by Mahima Shree

वक़्त की आँखों पर चढ़ा सदियों की सामंती धुँध
हर बार स्त्रीत्व को परखने के नये पैमाने गढे़
आत्मा पर चढ़े भय के कोहरे में क़ैद
एक ही धुरी पर धूमती रही स्त्री

कोहरे को चीर नये रास्ते बनाने के जतन में
लहूलुहान करती रही सीना
जीवन के चाक पर अनजाने ही पीसती गई सपनों के बिरवे
कुचलती रही उँगलियाँ

एक दिन कहानी का पटाक्षेप होगा
बारिश की बूँदाबाँदी के बाद
आसमान के माथे पर लहकेगा सुनहरा सूरज
धरती के गर्भनाल से क्षितिज के सीने तक
समानता का सतरंगी इन्द्रधनुष चमकेगा
हरियाएगी धरती, टहकेगा बिरवा, फलेगा प्रेम…

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