दुःखी दिनों में आदमी कविता नहीं लिखता
दुःखी दिनों में आदमी बहुत कुछ करता है
लतीफ़े सुनाने से ज़हर खाने तक
लेकिन वह कविता नहीं लिखता

दुःखी दिनों में आदमी
दिन की रौशनी में रोने के लिए अँधेरा ढूँढता है
और चालीस की उम्र में भी
माँ की गोद जैसी
कोई सुरक्षित जगह खोजता है

दुःखी दिनों में आदमी बहुत कुछ सोचता है
मसलन झील के पानी की गहराई
और शहर की सबसे बड़ी इमारत की मंज़िलें
और साथ ही साथ
एक ख़ामोश भाषा में चीख़ता है
कि उसके सारे प्रियजन
झील पर एक मज़बूत बाँध बनाकर खड़े हो जाएँ
और इमारत में चलती लिफ़्ट को रोक लें
लेकिन प्रियजन तो पेड़ होते हैं
छाया देते हैं
हवा से दुलरा सकते हैं
बाँध नहीं बना सकते
बाँध तो आदमी ख़ुद ही बनता है

दुःखी दिनों में आदमी
एक मज़बूत या कमज़ोर बाँध तो बनता है
लेकिन कविता नहीं लिखता।

कुमार विकल की कविता 'एक प्रेम कविता'

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कुमार विकल
कुमार विकल (1935-1997) पंजाबी मूल के हिन्दी भाषा के एक जाने-माने कवि थे।

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