1

एक कवि ने कहा-
‘दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए’*
यह बात दुनिया और हाथ
दोनों के लिए अच्छी थी

फिर एक दिन
दुनिया की गर्दन हाथों में आ फँसी

कुछ लोगों ने कहा-
दुनिया के अधिकांश हाथ अपराधों में लिप्त हैं
लेकिन बहुत से लोगों का मानना था
कि हाथों का अधिक इस्तेमाल आँसू पोछने में किया गया,
और उससे भी अधिक चूमे गए हाथ

देवताओं ने हमेशा हाथों को अपने बचाव में खड़ा किया
एक साथ कई-कई चमत्कारिक हाथ
मगर अफ़सोस
मनुष्यों का दुःख हरने को उनके हाथ नाकाफ़ी थे

इस दुनिया के तमाम अच्छे और बुरे काम इन्हीं हाथों से किए गए

सृष्टि की रचना में
पहले दृश्य रचे गए
फिर आँखें
सुगन्ध से भरी धरती को श्वास में भरने के लिए
नासिका रची गई
ऐसे ही रचे गए इस देह के भिन्न-भिन्न अंग
स्वाद के लिए जिह्वा
प्रकृति के संगीत श्रवण के लिए कान
दिग-दिगंत फैला प्रकृति के सौन्दर्य का साम्राज्य
उन तक पहुँच सके
इसलिए रचे गए पैर

और सबसे अन्त में रचे गए हाथ
सब कुछ को सुन्दर बनाए रखने के लिए।

2

कानों में ध्वनि ताज़ा है
घास छीलते सुन्दर हाथों की चंचलता
जिसकी लय में धुन रचती थीं बदरंग चूड़ियाँ

अदौरी, फुलौरी पारती हथेलियों की नसों से
स्वाद का स्तोत्र फूटता था
मेरे अनुभव के इर्द-गिर्द
ऐसे हाथों से रोज़ सामना होता था
धान पीटते, दौनी करते हाथ
आँगन लीपते, चूड़ा कूटते हाथ

मैंने उन्हीं दिनों जाना
इस संसार को हाथों ने ही सुन्दर बनाया

फिर उग आए सुन्दरता के ख़िलाफ़
नष्ट करने क्रूर, दैत्य जैसे हाथ
उन्हीं हाथों से बनाए गए बम
लूटी गई अस्मत
धर्म के नाम पर हाथ-हाथ में फ़र्क़ किए जाने लगे

उस दिन ख़ौफ़ से सहम गई मानवता
जब एक मरते हुए बच्चे ने कहा-
“मैं तुम सबकी शिकायत भगवान से कर दूँगा।”

और इस वक़्त
वायरस एक दूत की तरह आया
और बता गया
हाथों को साफ़ से लेकर संयमित रखने की कला

गिरती जा रही मनुष्यता से
हाथ खींच लेने का वक़्त आ गया है शायद
इस बात को ध्यान में रखते हुए
कि ईश्वर किसी भी रूप में लौट सकता है।

*केदारनाथ सिंह की एक काव्य-पंक्ति