जेठ का ताप
झेलते हुए भी जिन वक्षों का
क्षीर नहीं सूखा था,
सरकारी वायदों के
पूरा होने के इन्तज़ार में
शोणित हो चले हैं

पिघलते कोलतार पर
देग नापते हुए
जिनकी चप्पलों की परतें नहीं उधड़ीं,
आला अफ़सरों के
दफ़्तर में पड़ी कीलें
सीधे उनकी छातियों के व्रणों में जा धँसी

वज्रपात तक झेल जानेवाली
मिन्नतों से सरमाया
जो छतें कभी नहीं गिरीं,
पिछले चुनावी फ़रमानों में
उन पर अदालती ओले बरसे
भूगर्भ में पुरातत्व का एक अंश बन गईं

वेदना से भरी तमाम कविताओं ने
संघर्ष का यशगान किया
मरी हुई अपेक्षाओं को
जीवनदान नहीं दे पायीं

प्रेम कविताओं का अतिरेक बन गया
और वेदनाएँ मौजूदा अवसर

लौटे हुए कल और
गुज़रने वाले कल के बीच
सारी उपमाएँ धरी रह गईं

मनुष्य दुत्कार से ज़्यादा
कुछ ना पा सका
आशंकाओं के बोझ तले
अपने घर से दिशाहीन
किसी पराये शहर की सड़क पर
चलते-चलते मारा गया…

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आदर्श भूषण
आदर्श भूषण दिल्ली यूनिवर्सिटी से गणित से एम. एस. सी. कर रहे हैं। कविताएँ लिखते हैं और हिन्दी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है।

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