मुझे लड़नी है एक छोटी-सी लड़ाई
एक झूठी लड़ाई में मैं इतना थक गया हूँ
कि किसी बड़ी लड़ाई के क़ाबिल नहीं रहा।

मुझे लड़ना नहीं अब—
किसी छोटे क़द वाले आदमी के इशारे पर,
जो अपना क़द लम्बा करने के लिए मुझे युद्ध में झोंक देता है।

मुझे लड़ना नहीं—
किसी प्रतीक के लिए
किसी नाम के लिए
किसी बड़े प्रोग्राम के लिए
मुझे लड़नी है एक छोटी-सी लड़ाई!

छोटे लोगों के लिए
छोटी बातों के लिए
मुझे लड़ना है एक मामूली क्लर्क के लिए
जो बिना चार्जशीट मुअत्तिल हो जाता है
जो पेट में अल्सर का दर्द लिए
जेबों में न्याय की अर्ज़ी की प्रतिलिपियाँ भरकर
नौकरशाही के फ़ौलादी दरवाज़े
अपनी कमज़ोर मुठ्ठियों से खटखटाता है।

मुझे लड़ना है—
जनतंत्र में उग रहे वनतंत्र के ख़िलाफ़
जिसमें एक गैण्डानुमा आदमी दनदनाता है
मुझे लड़ना है—
अपनी ही कविताओं के बिम्बों के ख़िलाफ़
जिनके अंधेरे में मुझसे
ज़िन्दगी का उजाला छूट जाता है।

कुमार विकल की कविता 'दोपहर का भोजन'

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कुमार विकल
कुमार विकल (1935-1997) पंजाबी मूल के हिन्दी भाषा के एक जाने-माने कवि थे।

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