घूँघट

‘Ghoonghat’, a poem by Santwana Shrikant

घूँघट ढक लेता है
औरतों का आसमान,
चाँद जिसकी उपमेय
बनने की ख़्वाहिश में थी,
वो छिप जाता है
उसकी आँखों के
नीचे की स्याह ज़मीन में।

वह अन्नपूर्णा बनकर
भरती है सबका पेट,
उसके अमाशय में
पड़ जाते हैं छाले
रोटियाँ सेंकते-सेंकते।

घूँघट ढक लेता है
औरतों का आसमान,
आख़िर में उसी के नीचे
वह बना लेती है
अपने सपनों का घरौंदा
वक़्त की रेत पर
वह चलती रहती है,
उलझी रहती है, अनवरत।

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