हरिहर काका के यहाँ से मैं अभी-अभी लौटा हूँ। कल भी उनके यहाँ गया था, लेकिन न तो वह कल ही कुछ कह सके और न आज ही। दोनों दिन उनके पास मैं देर तक बैठा रहा, लेकिन उन्हाेंने कोई बातचीत नहीं की। जब उनकी तबीयत के बारे में पूछा तब उन्होंने सिर उठाकर एक बार मुझे देखा। फिर सिर झुकाया तो दुबारा मेरी ओर नहीं देखा। हालाँकि उनकी एक ही नज़र बहुत कुछ कह गई। जिन यन्त्रणाओं के बीच वह घिरे थे और जिस मनःस्थिति में जी रहे थे, उसमें आँखें ही बहुत कुछ कह देती हैं, मुँह खोलने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

हरिहर काका की ज़िन्दगी से मैं बहुत गहरे में जुड़ा हूँ। अपने गाँव में जिन चन्द लोगों को मैं सम्मान देता हूँ, उनमें हरिहर काका भी एक हैं। हरिहर काका के प्रति मेरी आसक्ति के अनेक व्यावहारिक और वैचारिक कारण हैं। उनमें प्रमुख कारण दो हैं। एक तो यह कि हरिहर काका मेरे पड़ोस में रहते हैं और दूसरा कारण यह कि मेरी माँ बताती है, हरिहर काका बचपन में मुझे बहुत दुलार करते थे। अपने कन्धे पर बैठाकर घुमाया करते थे। एक पिता अपने बच्चे को जितना प्यार करता है, उससे कहीं ज़्यादा प्यार हरिहर काका मुझे करते थे। और जब मैं सयाना हुआ तब मेरी पहली दोस्ती हरिहर काका के साथ ही हुई। हरिहर काका ने भी जैसे मुझसे दोस्ती के लिए ही इतनी उम्र तक प्रतीक्षा की थी। माँ बताती है कि मुझसे पहले गाँव में किसी अन्य से उनकी इतनी गहरी दोस्ती नहीं हुई थी। वह मुझसे कुछ भी नहीं छिपाते थे। ख़ूब खुलकर बातें करते थे। लेकिन फ़िलहाल मुझसे भी कुछ कहना उन्होंने बन्द कर दिया है। उनकी इस स्थिति ने मुझे चिन्तित कर दिया है। जैसे कोई नाव बीच मझधार में फँसी हो और उस पर सवार लोग चिल्लाकर भी अपनी रक्षा न कर सकते हाें, क्योंकि उनकी चिल्लाहट दूर तक फैले सागर के बीच उठती-गिरती लहरों में विलीन हो जाने के अतिरिक्त कर ही क्या सकती है? मौन होकर जल-समाधि लेने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं। लेकिन मन इसे मानने को क़तई तैयार नहीं। जीने की लालसा की वजह से बेचैनी और छटपटाहट बढ़ गई हो, कुछ ऐसी ही स्थिति के बीच हरिहर काका घिर गए हैं।

हरिहर काका के बारे में मैं सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि वह यह समझ नहीं पा रहे हैं कि कहें तो क्या कहें? अब कोई ऐसी बात नहीं जिसे कहकर वह हल्के हो सकें। कोई ऐसी उक्ति नहीं जिसे कहकर वे मुक्ति पा सकें। हरिहर काका की स्थिति में मैं भी होता तो निश्चय ही इस गूँगेपन का शिकार हो जाता।

हरिहर काका इस स्थिति में कैसे आ फँसे? यह कौन-सी स्थिति है? इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? यह सब बताने से पहले अपने गाँव का और ख़ासकर अपने गाँव की ठाकुरबारी का संक्षिप्त परिचय मैं आपको दे देना उचित समझता हूँ क्योंकि उसके बिना तो यह कहानी अधूरी ही रह जाएगी।

मेरा गाँव क़स्बाई शहर आरा से चालीस किलोमीटर की दूरी पर है। हसनबाज़ार बस स्टैण्ड के पास। गाँव की कुल आबादी ढाई-तीन हज़ार होगी। गाँव में तीन प्रमुख स्थान हैं। गाँव के पश्चिम किनारे का बड़ा-सा तालाब। गाँव के मध्य स्थित बरगद का पुराना वृक्ष और गाँव के पूरब में ठाकुरजी का विशाल मन्दिर, जिसे गाँव के लोग ठाकुरबारी कहते हैं।

गाँव में इस ठाकुरबारी की स्थापना कब हुई, इसकी ठीक-ठीक जानकारी किसी को नहीं। इस सम्बन्ध में गाँव में जो कहानी प्रचलित है वह यह कि वर्षों पहले जब यह गाँव पूरी तरह बसा भी नहीं था, कहीं से एक सन्त आकर इस स्थान पर झोंपड़ी बना रहने लगे थे। वह सुबह-शाम यहाँ ठाकुरजी की पूजा करते थे। लोगों से माँगकर खा लेते थे और पूजा-पाठ की भावना जाग्रत करते थे। बाद में लोगों ने चन्दा करके यहाँ ठाकुरजी का एक छोटा-सा मन्दिर बनवा दिया। फिर जैसे-जैसे गाँव बसता गया और आबादी बढ़ती गई, मन्दिर के कलेवर में भी विस्तार होता गया। लोग ठाकुरजी को मनौती मनाते कि पुत्र हो, मुक़दमे में विजय हो, लड़की की शादी अच्छे घर में तय हो, लड़के को नौकरी मिल जाए। फिर इसमें जिनको सफलता मिलती, वह ख़ुशी में ठाकुरजी पर रुपये, ज़ेवर, अनाज चढ़ाते। अधिक ख़ुशी होती तो ठाकुरजी के नाम अपने खेत का एक छोटा-सा टुकड़ा लिख देते। यह परम्परा आज तक जारी है। अधिकांश लोगों को विश्वास है कि उन्हें अच्छी फ़सल होती है तो ठाकुरजी की कृपा से। मुक़दमे में उनकी जीत हुई तो ठाकुरजी के चलते। लड़की की शादी इसीलिए जल्दी तय हो गई, क्योंकि ठाकुरजी को मनौती मनायी गई थी। लोगों के इस विश्वास का ही यह परिणाम है कि गाँव की अन्य चीज़ों की तुलना में ठाकुरबारी का विकास हज़ार गुना अधिक हुआ है। अब तो यह गाँव ठाकुरबारी से ही पहचाना जाता है। यह ठाकुरबारी न सिर्फ़ मेरे गाँव की एक बड़ी और विशाल ठाकुरबारी है बल्कि पूरे इलाक़े में इसकी जोड़ की दूसरी ठाकुरबारी नहीं।

ठाकुरबारी के नाम पर बीस बीघे खेत हैं। धार्मिक लोगों की एक समिति है, जो ठाकुरबारी की देख-रेख और संचालन के लिए प्रत्येक तीन साल पर एक महन्त और एक पुजारी की नियुक्ति करती है।

ठाकुरबारी का काम लोगों के अन्दर ठाकुरजी के प्रति भक्ति-भावना पैदा करना तथा धर्म से विमुख हो रहे लोगों को रास्ते पर लाना है। ठाकुरबारी में भजन-कीर्तन की आवाज़ बराबर गूँजती रहती है। गाँव जब भी बाढ़ या सूखे की चपेट में आता है, ठाकुरबारी के अहाते में तम्बू लग जाता है। लोग और ठाकुरबारी के साधु-सन्त अखण्ड हरिकीर्तन शुरू कर देते हैं। इसके अतिरिक्त गाँव में किसी भी पर्व-त्योहार की शुरुआत ठाकुरबारी से ही होती है। होली में सबसे पहले गुलाल ठाकुरजी को ही चढ़ाया जाता है। दीवाली का पहला दीप ठाकुरबारी में ही जलता है। जन्म, शादी और जनेऊ के अवसर पर अन्न-वस्त्र की पहली भेंट ठाकुरजी के नाम की जाती है। ठाकुरबारी के ब्राह्मण-साधु व्रत-कथाओं के दिन घर-घर घूमकर कथावाचन करते हैं। लोगों के खलिहान में जब फ़सल की दवनी होकर अनाज की ‘ढेरी’ तैयार हो जाती है, तब ठाकुरजी के नाम ‘अगउम’ निकालकर ही लोग अनाज अपने घर ले जाते हैं।

ठाकुरबारी के साथ अधिकांश लोगों का सम्बन्ध बहुत ही घनिष्ठ है—मन और तन दोनों स्तर पर। कृषि-कार्य से अपना बचा हुआ समय वे ठाकुरबारी में ही बिताते हैं। ठाकुरबारी में साधु-सन्तों का प्रवचन सुन और ठाकुरजी का दर्शन कर वे अपना यह जीवन सार्थक मानने लगते हैं। उन्हें यह महसूस होता है कि ठाकुरबारी में प्रवेश करते ही वे पवित्र हो जाते हैं। उनके पिछले सारे पाप अपने आप ख़त्म हो जाते हैं।

परिस्थितिवश इधर हरिहर काका ने ठाकुरबारी में जाना बन्द कर दिया है। पहले वह अकसर ही ठाकुरबारी में जाते थे। मन बहलाने के लिए कभी-कभी मैं भी ठाकुरबारी में जाता हूँ। लेकिन वहाँ के साधु-सन्त मुझे फूटी आँखों नहीं सुहाते। काम-धाम करने में उनकी कोई रुचि नहीं। ठाकुरजी को भोग लगाने के नाम पर दोनों जून हलवा-पूड़ी खाते हैं और आराम से पड़े रहते हैं। उन्हें अगर कुछ आता है तो सिर्फ़ बात बनाना आता है।

हरिहर काका चार भाई हैं। सबकी शादी हो चुकी है। हरिहर काका के अलावा सबके बाल-बच्चे हैं। बड़े और छोटे भाई के लड़के काफ़ी सयाने हो गए हैं। दो की शादियाँ हो गई हैं। उनमें से एक पढ़-लिखकर शहर के किसी दफ़्तर में क्लर्की करने लगा है। लेकिन हरिहर काका की अपनी देह से कोई औलाद नहीं। भाइयों में हरिहर काका का नम्बर दूसरा है। औलाद के लिए उन्होंने दो शादियाँ कीं। लम्बे समय तक प्रतीक्षारत रहे। लेकिन बिना बच्चा जने उनकी दोनों पत्नियाँ स्वर्ग सिधार गईं। लोगों ने तीसरी शादी करने की सलाह दी लेकिन अपनी गिरती हुई उम्र और धार्मिक संस्कारों की वजह से हरिहर काका ने इंकार कर दिया। वह इत्मीनान और प्रेम से अपने भाइयों के परिवार के साथ रहने लगे।

हरिहर काका के परिवार के पास कुल साठ बीघे खेत हैं। प्रत्येक भाई के हिस्से पन्द्रह बीघे पड़ेंगे । कृषि-कार्य पर ये लोग निर्भर हैं। शायद इसीलिए अब तक संयुक्त परिवार के रूप में ही रहते आ रहे हैं।

हरिहर काका के तीनों भाइयों ने अपनी पत्नियों को यह सीख दी थी कि हरिहर काका की अच्छी तरह सेवा करें। समय पर उन्हें नाश्ता-खाना दें। किसी बात की तकलीफ़ न होने दें। कुछ दिनों तक वे हरिहर काका की खोज-ख़बर लेती रहीं। फिर उन्हें कौन पूछने वाला? ‘ठहर-चौका’ लगाकर पंखा झलते हुए अपने मर्दों को अच्छे-अच्छे व्यंजन खिलातीं। हरिहर काका के आगे तो बची-खुची चीज़ें आतीं। कभी-कभी तो हरिहर काका को रूखा-सूखा खाकर ही सन्तोष करना पड़ता।

अगर कभी हरिहर काका की तबीयत ख़राब हो जाती तो वह मुसीबत में पड़ जाते। इतने बड़े परिवार के रहते हुए भी कोई उन्हें पानी देने वाला तक नहीं। सभी अपने कामों में मशग़ूल। बच्चे या तो पढ़-लिख रहे होते या धमाचौकड़ी मचाते। मर्द खेतों पर गए रहते। औरतें हाल पूछने भी नहीं आतीं। दालान के कमरे में अकेले पड़े हरिहर काका को स्वयं उठकर अपनी ज़रूरतों की पूर्ति करनी पड़ती। ऐसे वक़्त अपनी पत्नियों को याद कर-करके हरिहर काका की आँखें भर आतीं। भाइयों के परिवार के प्रति मोहभंग की शुरुआत इन्हीं क्षणों में हुई थी। और फिर, एक दिन तो विस्फोट ही हो गया। उस दिन हरिहर काका की सहन-शक्ति जवाब दे गई। उस दिन शहर में क्लर्की करने वाले भतीजे का एक दोस्त गाँव आया था। उसी के आगमन के उपलक्ष्य में दो-तीन तरह की सब्ज़ी, बजके, चटनी, रायता आदि बने थे। बीमारी से उठे हरिहर काका का मन स्वादिष्ट भोजन के लिए बेचैन था। मन ही मन उन्होंने अपने भतीजे के दोस्त की सराहना की, जिसके बहाने उन्हें अच्छी चीज़ें खाने को मिलने वाली थीं। लेकिन बातें बिलकुल विपरीत हुईं। सबों ने खाना खा लिया, उनको कोई पूछने तक नहीं आया। उनके तीनों भाई खाना खाकर खलिहान में चले गए। दवनी हो रही थी। वे इस बात के प्रति निश्चिन्त थे कि हरिहर काका को तो पहले ही खिला दिया गया होगा।

अन्त में हरिहर काका ने स्वयं दालान के कमरे से निकल हवेली में प्रवेश किया। तब उनके छोटे भाई की पत्नी ने रूखा-सूखा खाना लाकर उनके सामने परोस दिया—भात, मट्ठा और अचार। बस, हरिहर काका के बदन में तो जैसे आग लग गई। उन्होंने थाली उठाकर बीच आँगन में फेंक दी। झन्न की तेज़ आवाज़ के साथ आँगन में थाली गिरी। भात बिखर गया। विभिन्न घरों में बैठी लड़कियाँ, बहुएँ सब एक ही साथ बाहर निकल आयीं। हरिहर काका गरजते हुए हवेली से दालान की ओर चल पड़े—”समझ रही हो कि मुफ़्त में खिलाती हो, तो अपने मन से यह बात निकाल देना। मेरे हिस्से के खेत की पैदावार इसी घर में आती है। उसमें तो मैं दो-चार नौकर रख लूँ, आराम से खाऊँ, तब भी कमी नहीं होगी। मैं अनाथ और बेसहारा नहीं हूँ। मेरे धन पर तो तुम सब मौज कर रही हो। लेकिन अब मैं तुम सबों को बताऊँगा…आदि।”

हरिहर काका जिस वक़्त यह सब बोल रहे थे, उस वक़्त ठाकुरबारी के पुजारी जी उनके दालान पर ही विराजमान थे। वार्षिक हुमाध के लिए वह घी और शकील लेने आए थे। लौटकर उन्होंने महन्त जी को विस्तार के साथ सारी बात बतायी। उनके कान खड़े हो गए। वह दिन उन्हें बहुत शुभ महसूस हुआ। उस दिन को उन्होंने ऐसे ही गुज़र जाने देना उचित नहीं समझा। तत्क्षण टीका-तिलक लगा, कन्धे पर रामनामी लिखी चादर डाल ठाकुरबारी से चल पड़े। संयोग अच्छा था। हरिहर के दालान तक नहीं जाना पड़ा। रास्ते में ही हरिहर मिल गए। ग़ुस्से में घर से निकल वह खलिहान की ओर जा रहे थे। लेकिन महन्त जी ने उन्हें खलिहान की ओर नहीं जाने दिया। अपने साथ ठाकुरबारी पर लेते आए। फिर एकान्त कमरे में उन्हें बैठा, ख़ूब प्रेम से समझाने लगे—”हरिहर! यहाँ कोई किसी का नहीं है। सब माया का बन्धन है। तू तो धार्मिक प्रवृत्ति का आदमी है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि तुम इस बन्धन में कैसे फँस गए? ईश्वर में भक्ति लगाओ। उसके सिवाय कोई तुम्हारा अपना नहीं। पत्नी, बेटे, भाई-बन्धु सब स्वार्थ के साथी हैं। जिस दिन उन्हें लगेगा कि तुमसे उनका स्वार्थ सधने वाला नहीं, उस दिन वे तुम्हें पूछेंगे तक नहीं। इसीलिए ज्ञानी, सन्त, महात्मा ईश्वर के सिवाय किसी और में प्रेम नहीं लगाते। …तुम्हारे हिस्से में पन्द्रह बीघे खेत हैं। उसी के चलते तुम्हारे भाई के परिवार तुम्हें पकड़े हुए हैं। तुम एक दिन कहकर तो देख लो कि अपना खेत उन्हें न देकर दूसरे को लिख दोगे, वह तुमसे बोलना बन्द कर देंगे। ख़ून का रिश्ता ख़त्म हो जाएगा। तुम्हारे भले के लिए मैं बहुत दिनों से सोच रहा था लेकिन संकोचवश नहीं कह रहा था। आज कह देता हूँ, तुम अपने हिस्से का खेत ठाकुरजी के नाम पर लिख दो। सीधे बैकुण्ठ को प्राप्त करोगे। तीनों लोक में तुम्हारी कीर्ति जगमगा उठेगी। जब तक चाँद-सूरज रहेंगे, तब तक लोग तुम्हें याद करेंगे। ठाकुरजी के नाम पर ज़मीन लिख देना, तुम्हारे जीवन का महादान होगा। साधु-सन्त तुम्हारे पाँव पखारेंगे। सभी तुम्हारा यशोगान करेंगे। तुम्हारा यह जीवन सार्थक हो जाएगा। अपनी शेष ज़िन्दगी तुम इसी ठाकुरबारी में गुज़ारना, तुम्हें किसी चीज़ की कमी नहीं होगी। एक माँगोगे तो चार हाज़िर की जाएँगी। हम तुम्हें सिर-आँखों पर उठाकर रखेंगे। ठाकुरजी के साथ-साथ तुम्हारी आरती भी लगाएँगे। भाई का परिवार तुम्हारे लिए कुछ नहीं करेगा। पता नहीं पूर्वजन्म में तुमने कौन-सा पाप किया था कि तुम्हारी दोनों पत्नियाँ अकालमृत्यु को प्राप्त हुईं। तुमने औलाद का मुँह तक नहीं देखा। अपना यह जन्म तुम अकारथ न जाने दो। ईश्वर को एक भर दोगे तो दस भर पाओगे। मैं अपने लिए तो तुमसे माँग नहीं रहा हूँ। तुम्हारा यह लोक और परलोक दोनों बन जाएँ, इसकी राह मैं तुम्हें बता रहा हूँ…।”

हरिहर देर तक महन्त जी की बातें सुनते रहे। महन्त जी की बातें उनके मन में बैठती जा रही थीं। ठीक ही तो कह रहे हैं महन्त जी। कौन किसका है? पन्द्रह बीघे खेत की फ़सल भाइयों के परिवार को देते हैं, तब तो कोई पूछता नहीं, अगर कुछ न दें तब क्या हालत होगी? उनके जीवन में तो यह स्थिति है, मरने के बाद कौन उन्हें याद करेगा? सीधे-सीधे उनके खेत हड़प जाएँगे। ठाकुरजी के नाम लिख देंगे तो पुश्तों तक लोग उन्हें याद करेंगे। अब तक के जीवन में तो ईश्वर के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। अन्तिम समय तो यह बड़ा पुण्य कमा लें। लेकिन यह सोचते हुए भी हरिहर काका का मुँह खुल नहीं रहा था। भाई का परिवार तो अपना ही होता है। उनको न देकर ठाकुरबारी में दे देना उनके साथ धोखा और विश्वासघात होगा…।

अपनी बात समाप्त कर महन्त जी प्रतिक्रिया जानने के लिए हरिहर की ओर देखने लगे। उन्होंने मुँह से तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके चेहरे के परिवर्तित भाव महन्त जी की अनुभवी आँखों से छिपे न रह सके। अपनी सफलता पर महन्त जी को बहुत ख़ुशी हुई। उन्होंने सही जगह वार किया है। इसके बाद उसी वक़्त ठाकुरबारी के दो सेवकों को बुलाकर आदेश दिया कि एक साफ़-सुथरे कमरे में पलंग पर बिस्तरा लगाकर उनके आराम का इन्तज़ाम करें। फिर तो महन्त जी के कहने में जितना समय लगा था, उससे कम समय में ही, सेवकों ने हरिहर काका के मना करने के बावजूद उन्हें एक सुन्दर कमरे में पलंग पर जा लिटाया। और महन्त जी! उन्होंने पुजारी जी को यह समझा दिया कि हरिहर के लिए विशेष रूप से भोजन की व्यवस्था करें। हरिहर काका को महन्त जी एक विशेष उद्देश्य से ले गए थे, इसीलिए ठाकुरबारी में चहल-पहल शुरू हो गई।

इधर शाम को हरिहर काका के भाई जब खलिहान से लौटे तब उन्हें इस दुर्घटना का पता चला। पहले तो अपनी पत्नियों पर वे ख़ूब बरसे, फिर एक जगह बैठकर चिन्तामग्न हो गए। हालाँकि गाँव के किसी व्यक्ति ने भी उनसे कुछ नहीं कहा था। महन्त जी ने हरिहर काका को क्या-क्या समझाया है, इसकी भी जानकारी उन्हें नहीं थी। लेकिन इसके बावजूद उनका मन शंकालु और बेचैन हो गया। दरअसल, बहुत सारी बातें ऐसी होती हैं, जिनकी जानकारी बिना बताए ही लोगों को मिल जाती है।

शाम गहराते-गहराते हरिहर काका के तीनों भाई ठाकुरबारी पहुँचे। उन्होंने हरिहर काका को वापस घर चलने के लिए कहा। इससे पहले कि हरिहर काका कुछ कहते, महन्त जी बीच में आ गए—”आज हरिहर को यहीं रहने दो… बीमारी से उठा है। इसका मन अशान्त है। ईश्वर के दरबार में रहेगा तो शान्ति मिलेगी…।”

लेकिन उनके भाई उन्हें घर ले चलने के लिए ज़िद करने लगे। इस पर ठाकुरबारी के साधु-सन्त उन्हें समझाने लगे। वहाँ उपस्थित गाँव के लोगों ने भी कहा कि एक रात ठाकुरबारी में रह जाएँगे तो क्या हो जाएगा? अन्ततः भाइयों को निराश हो वहाँ से लौटना पड़ा।

रात में हरिहर काका को भोग लगाने के लिए जो मिष्टान्न और व्यंजन मिले, वैसे उन्होंने कभी नहीं खाए थे। घी टपकते मालपुए, रस बुनिया, लड्डू, छेने की तरकारी, दही, खीर…। पुजारी जी ने स्वयं अपने हाथों से खाना परोसा था। पास में बैठे महन्त जी धर्म-चर्चा से मन में शान्ति पहुँचा रहे थे। एक ही रात में ठाकुरबारी में जो सुख-शान्ति और सन्तोष पाया, वह अपने अब तक के जीवन में उन्होंने नहीं पाया था।

इधर तीनों भाई रात-भर सो नहीं सके। भावी आशंका उनके मन को मथती रही। पन्द्रह बीघे खेत! इस गाँव की उपजाऊ ज़मीन! दो लाख से अधिक की सम्पत्ति! अगर हाथ से निकल गई तो फिर वह कहीं के न रहेंगे।

सुबह तड़के ही तीनों भाई पुनः ठाकुरबारी पहुँचे। हरिहर काका के पाँव पकड़ रोने लगे। अपनी पत्नियों की ग़लती के लिए माफ़ी माँगी तथा उन्हें दण्ड देने की बात कही। साथ ही ख़ून के रिश्ते की माया फैलायी। हरिहर काका का दिल पसीज गया। वह पुनः वापस घर लौट आए।

लेकिन यह क्या? इस बार अपने घर पर जो बदलाव उन्होंने लक्ष्य किया, उसने उन्हें सुखद आश्चर्य में डाल दिया। घर के छोटे-बड़े सब उन्हें सिर-आँखों पर उठाने को तैयार। भाइयों की पत्नियों ने उनके पैर पर माथा रख ग़लती के लिए क्षमा-याचना की। फिर उनकी आवभगत और जो ख़ातिर शुरू हुई, वैसी ख़ातिर किसी के यहाँ मेहमान आने पर भी नहीं होती होगी। उनकी रुचि और इच्छा के मुताबिक़ दोनों जून खाना-नाश्ता तैयार। पाँच महिलाएँ उनकी सेवा में मुस्तैद—तीन भाइयों की पत्नियाँ और दो उनकी बहुएँ। हरिहर काका आराम से दालान में पड़े रहते। जिस किसी चीज़ की इच्छा होती, आवाज़ लगाते ही हाज़िर। वे समझ गए थे कि यह सब महन्त जी के चलते ही हो रहा है, इसलिए महन्त जी के प्रति उनके मन में आदर और श्रद्धा के भाव निरन्तर बढ़ते ही जा रहे थे।ब

हुत बार ऐसा होता है कि बिना किसी के कुछ बताए गाँव के लोग असली तथ्य से स्वयं वाक़िफ़ हो जाते हैं। हरिहर काका की इस घटना के साथ ऐसा ही हुआ। दरअसल लोगों की ज़ुबान से घटनाओं की ज़ुबान ज़्यादा पैनी और असरदार होती है। घटनाएँ स्वयं ही बहुत कुछ कह देती हैं, लोगों के कहने की ज़रूरत नहीं रहती। न तो गाँव के लोगों से महन्त जी ने ही कुछ कहा था और न हरिहर काका के भाइयों ने ही। इसके बावजूद गाँव के लोग सच्चाई से अवगत हो गए थे। फिर तो गाँव की बैठकों में बातों का जो सिलसिला चल निकला, उसका कहीं कोई अन्त नहीं। हर जगह उन्हीं का प्रसंग शुरू। कुछ लोग कहते कि हरिहर को अपनी ज़मीन ठाकुरजी के नाम लिख देनी चाहिए। इससे उत्तम और कुछ नहीं। इससे कीर्ति भी अचल बनी रहती है। इसके विपरीत कुछ लोगों की मान्यता यह थी कि भाई का परिवार तो अपना ही होता है। अपनी जायदाद उन्हें न देना उनके साथ अन्याय करना होगा। ख़ून के रिश्ते के बीच दीवार बनानी होगी।

जितने मुँह, उतनी बातें। ऐसा ज़बरदस्त मसला पहले कभी नहीं मिला था, इसीलिए लोग मौन होना नहीं चाहते थे। अपने-अपने तरीक़े से समाधान ढूँढ रहे थे और प्रतीक्षा कर रहे थे कि कुछ घटित हो। हालाँकि इसी क्रम में बातें गर्माहट-भरी भी होने लगी थीं। लोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से दो वर्गों में बँटने लगे थे। कई बैठकों में दोनों वर्गों के बीच आपस में तू-तू, मैं-मैं भी होने लगी थी। एक वर्ग के लोग चाहते थे कि हरिहर अपने हिस्से की ज़मीन ठाकुरजी के नाम लिख दें। तब यह ठाकुरबारी न सिर्फ़ इलाक़े की ही सबसे बड़ी ठाकुरबारी होगी, बल्कि पूरे राज्य में इसका मुक़ाबला कोई दूसरी ठाकुरबारी नहीं कर सकेगी। इस वर्ग के लोग धार्मिक संस्कारों के लोग हैं। साथ ही किसी न किसी रूप में ठाकुरबारी से जुड़े हैं। असल में सुबह-शाम जब ठाकुरजी को भोग लगाया जाता है, तब साधु-सन्तों के साथ गाँव के कुछ पेटू और चटोर क़िस्म के लोग प्रसाद पाने के लिए वहाँ जुट जाते हैं। ये लोग इसी वर्ग के हिमायती हैं। दूसरे वर्ग में गाँव के प्रगतिशील विचारों वाले लोग तथा वैसे किसान हैं, जिनके यहाँ हरिहर जैसे औरत-मर्द पल रहे होते हैं। गाँव का वातावरण तनावपूर्ण हो गया था और लोग कुछ घटित होने की प्रतीक्षा करने लगे थे।

इधर भावी आशंकाओं को मद्देनज़र रखते हुए हरिहर काका के भाई उनसे यह निवेदन करने लगे थे कि अपनी ज़मीन वे उन्हें लिख दें। उनके सिवाय उनका और अपना है ही कौन? इस विषय पर हरिहर काका ने एकान्त में मुझसे काफ़ी देर तक बात की। अन्ततः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जीते-जी अपनी जायदाद का स्वामी किसी और को बनाना ठीक नहीं होगा। चाहे वह अपना भाई या मन्दिर का महन्त ही क्यों न हो? हमें अपने गाँव और इलाक़े के वे कुछ लोग याद आए, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में ही अपनी जायदाद अपने उत्तराधिकारियों या किसी अन्य को लिख दी थी, लेकिन इसके बाद उनका जीवन कुत्ते का जीवन हो गया। कोई उन्हें पूछने वाला नहीं रहा। हरिहर काका बिलकुल अनपढ़ व्यक्ति हैं, फिर भी इस बदलाव को उन्होंने समझ लिया और यह निश्चय किया कि जीते-जी किसी को ज़मीन नहीं लिखेंगे। अपने भाइयों को समझा दिया, मर जाऊँगा तो अपने आप मेरी ज़मीन तुम्हें मिल जाएगी। ज़मीन लेकर तो जाऊँगा नहीं। इसीलिए लिखवाने की क्या ज़रूरत?

उधर महन्त जी भी हरिहर काका की टोह में रहने लगे। जहाँ कहीं एकान्त पाते, कह उठते—”विलम्ब न करो हरिहर। शुभ काम में देर नहीं करते। चलकर ठाकुरजी के नाम ज़मीन बय कर दो। फिर पूरी ज़िन्दगी ठाकुरबारी में राज करो। मरोगे तो तुम्हारी आत्मा को ले जाने के लिए स्वर्ग से विमान आएगा। देवलोक को प्राप्त करोगे…।”

लेकिन हरिहर काका न ‘हाँ’ कहते और न ‘ना’। ‘ना’ कहकर वे महन्त जी को दुःखी करना नहीं चाहते थे क्योंकि भाई के परिवार से जो सुख-सुविधाएँ उन्हें मिल रही थीं, वे महन्त जी की कृपा से ही। और ‘हाँ’ तो उन्हें कहना है नहीं, क्योंकि अपनी ज़िन्दगी में अपनी ज़मीन उन्हें किसी को नहीं लिखनी। इस मुद्दे पर वे जागरूक हो गए थे।

पर बीतते समय के अनुसार महन्त जी की चिन्ताएँ बढ़ती जा रही थीं। जाल में फँसी चिड़िया पकड़ से बाहर हो गई थी, महन्त जी इस बात को सह नहीं पा रहे थे। महन्त जी को लग रहा था कि हरिहर धर्म-संकट में पड़ गया है। एक ओर वह चाहता है कि ठाकुरजी को लिख दूँ, किन्तु दूसरी ओर भाई के परिवार के माया-मोह में बँध जाता है। इस स्थिति में हरिहर का अपहरण कर ज़बरदस्ती उससे लिखवाने के अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प नहीं। बाद में हरिहर स्वयं राज़ी हो जाएगा।

महन्त जी लड़ाकू और दबंग प्रकृति के आदमी हैं। अपनी योजना को कार्य-रूप में परिणत करने के लिए वह जी-जान से जुट गए। हालाँकि यह सब गोपनीयता का निर्वाह करते हुए ही वह कर रहे थे। हरिहर काका के भाइयों को इसकी भनक तक नहीं थी।

बात अभी हाल की ही है। आधी रात के आस-पास ठाकुरबारी के साधु-सन्त और उनके पक्षधर भाला, गँड़ासा और बन्दूक़ से लैस एकाएक हरिहर काका के दालान पर आ धमके। हरिहर काका के भाई इस अप्रत्याशित हमले के लिए तैयार नहीं थे। इससे पहले कि वे जवाबी कार्रवाई करें और गुहार लगाकर अपने लोगों को जुटाएँ, तब तक आक्रमणकारी उनको पीठ पर लादकर चम्पत हो गए।

गाँव में किसी ने ऐसी घटना नहीं देखी थी, न सुनी ही थी। सारा गाँव जाग गया। शुभचिन्तक तो उनके यहाँ जुटने लगे, लेकिन अन्य लोग अपने दालान और मकान की छतों पर जमा होकर आहट लेने और बातचीत करने लगे।

हरिहर काका के भाई लोगों के साथ उन्हें ढूँढने निकले। उन्हें लगा कि यह महन्त का काम है। वे मय दल-बल ठाकुरबारी जा पहुँचे। वहाँ ख़ामोशी और शान्ति नज़र आयी। रोज़ की भाँति ठाकुरबारी का मुख्य फाटक बन्द था। वातावरण में रात का सन्नाटा और सूनापन व्याप्त मिला। उन्हें लगा, यह काम महन्त का नहीं, बाहर के डाकुओं का है। वे तो हरजाने की मोटी रक़म लेकर ही हरिहर काका को मुक्त करेंगे।

खोज में निकले लोग किसी दूसरी दिशा की ओर प्रस्थान करते कि इसी समय ठाकुरबारी के अन्दर से बातचीत करने की सम्मिलित, किन्तु धीमी आवाज़ सुनायी पड़ी। सबके कान खड़े हो गए। उन्हें यक़ीन हो गया कि हरिहर काका इसी में हैं। अब क्या सोचना? वे ठाकुरबारी का फाटक पीटने लगे। इसी समय ठाकुरबारी की छत से रोड़े और पत्थर उनके ऊपर गिरने लगे। वे तितर-बितर होने लगे। अपने हथियार सम्भाले। लेकिन हथियार सम्भालने से पहले ही ठाकुरबारी के कमरों की खिड़कियों से फायरिंग शुरू हो गई। एक नौजवान के पैर में गोली लग गई। वह गिर गया। उसके गिरते ही हरिहर काका के भाइयों के पक्षधर भाग चले। सिर्फ़ वे तीनों भाई बचे रह गए। अपने तीनों के बूते इस युद्ध को जीतना उन्हें सम्भव नहीं जान पड़ा। इसीलिए वे क़स्बे के पुलिस थाने की ओर दौड़ पड़े।

इधर ठाकुरबारी के भीतर महन्त और उनके कुछ चन्द विश्वासी साधु सादे और लिखे काग़ज़ों पर अनपढ़ हरिहर काका के अँगूठे के निशान जबरन ले रहे थे। हरिहर काका तो महन्त के इस व्यवहार से जैसे आसमान से ज़मीन में आ गए थे। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि महन्त जी इस रूप में भी आएँगे। जिस महन्त को वह आदरणीय एवं श्रद्धेय समझते थे, वह महन्त अब उन्हें घृणित, दुराचारी और पापी नज़र आने लगा था। अब वह उस महन्त की सूरत भी देखना नहीं चाहते थे। अब अपने भाइयों का परिवार महन्त की तुलना में उन्हें ज़्यादा पवित्र, नेक और अच्छा लगने लगा था। हरिहर काका ठाकुरबारी से अपने घर पहुँचने के लिए बेचैन थे। लेकिन लोग उन्हें पकड़े हुए थे और महन्त जी उन्हें समझा रहे थे—”तुम्हारे भले के लिए ही यह सब किया गया हरिहर। अभी तुम्हें लगेगा कि हम लोगों ने तुम्हारे साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती की, लेकिन बाद में तुम समझ जाओगे कि जिस धर्म-संकट में तुम पड़े थे, उससे उबारने के लिए यही एकमात्र रास्ता था…!”

एक ओर ठाकुरबारी के भीतर जबरन अँगूठे का निशान लेने और पकड़कर समझाने का कार्य चल रहा था तो दूसरी ओर हरिहर काका के तीनों भाई सुबह होने से पहले ही पुलिस की जीप के साथ ठाकुरबारी आ पहुँचे। जीप से तीनों भाई, एक दरोगा और पुलिस के आठ जवान उतरे। पुलिस इंचार्ज ने ठाकुरबारी के फाटक पर आवाज़ लगायी। दस्तक दी। लेकिन अन्दर से कोई जवाब नहीं। अब पुलिस के जवानों ने ठाकुरबारी के चारों तरफ़ घेरा डालना शुरू किया। ठाकुरबारी अगर छोटी रहती तो पुलिस के जवान आसानी से उसे घेर लेते, लेकिन विशालकाय ठाकुरबारी को पुलिस के सीमित जवान घेर सकने में असमर्थ साबित हो रहे थे। फिर भी जितना सम्भव हो सका, उस रूप में उन्होंने घेरा डाल दिया और अपना-अपना मोर्चा सम्भाल सुबह की प्रतीक्षा करने लगे।

हरिहर काका के भाइयों ने सोचा था कि जब वे पुलिस के साथ ठाकुरबारी पहुँचेंगे तो ठाकुरबारी के भीतर से हमले होंगे और साधु-सन्त रँगे हाथों पकड़ लिए जाएँगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। ठाकुरबारी के अन्दर से एक रोड़ा भी बाहर नहीं आया। शायद पुलिस को आते हुए उन्होंने देख लिया था।

सुबह होने में अभी कुछ देर थी, इसलिए पुलिस इंचार्ज रह-रहकर ठाकुरबारी का फाटक खोलने तथा साधु-सन्तों को आत्मसमर्पण करने के लिए आवाज़ लगा रहे थे। साथ ही पुलिस वर्ग की ओर से हवाई फ़ायर भी किए जा रहे थे, लेकिन ठाकुरबारी की ओर से कोई जवाब नहीं आ रहा था।

सुबह तड़के एक वृद्ध साधु ने ठाकुरबारी का फाटक खोल दिया। उस साधु की उम्र अस्सी वर्ष से अधिक की होगी। वह लाठी के सहारे काँपते हुए खड़ा था। पुलिस इंचार्ज ने उस वृद्ध साधु के पास पहुँच हरिहर काका तथा ठाकुरबारी के महन्त, पुजारी एवं अन्य साधुओं के बारे में पूछा। लेकिन उसने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया। पुलिस इंचार्ज ने कई बार उससे पूछा। डाँट लगाई, धमकियाँ दीं, लेकिन हर बार एक ही वाक्य कहता, “मुझे कुछ मालूम नहीं।”

ऐसे वक़्त पुलिस के लोग मार-पीट का सहारा लेकर भी बात उगलवाते हैं; लेकिन उस साधु की वय देखकर पुलिस इंचार्ज को महटिया जाना पड़ा।

पुलिस इंचार्ज के नेतृत्व में पुलिस के जवान ठाकुरबारी की तलाशी लेने लगे। लेकिन न तो ठाकुरबारी के नीचे के कमरों में ही कोई पाया गया और न छत के कमरों में ही। पुलिस के जवानों ने ख़ूब छान-बीन की, उस वृद्ध साधु के अलावा कोई दूसरा ठाकुरबारी में नहीं मिला।

हरिहर काका के भाई चिन्ता, परेशानी और दुखद आश्चर्य से घिर गए। ठाकुरबारी के महन्त और साधु-सन्त हरिहर काका को लेकर कहाँ भाग गए? अब क्या होगा? काफ़ी पैसे ख़र्च कर पुलिस को लाए थे। पुलिस के साथ आने के बाद वह अन्दर ही अन्दर गर्व महसूस कर रहे थे। उन्हें लग रहा था कि अब भाई को वे आसानी से घर ले जाएँगे तथा साधु-सन्तों को जेल भिजवा देंगे। लेकिन दोनों में से एक भी नहीं हुआ।

ठाकुरबारी के जो कमरे खुले थे, उनकी तलाशी पहले ली गई थी। बाद में जिन कमरों की चिटकिनी बन्द थी, उन्हें भी खोलकर देखा गया था। एक कमरे के बाहर बड़ा-सा ताला लटक रहा था। पुलिस और हरिहर काका के भाई सब वहीं एकत्र हो गए। उस कमरे की कुँजी की माँग वृद्ध साधु से की गई तो उसने साफ़ कह दिया, “मेरे पास नहीं।”

जब उससे पूछा गया, “इस कमरे में क्या है?” तब उसने जवाब दिया, “अनाज है।”

पुलिस इंचार्ज अभी यह सोच ही रहे थे कि इस कमरे का ताला तोड़कर देखा जाए या छोड़ दिया जाए कि अचानक उस कमरे के दरवाज़े को भीतर से किसी ने धक्का देना शुरू किया। पुलिस के जवान सावधान हो गए। ताला तोड़कर कमरे का दरवाज़ा खोला गया। कमरे के भीतर हरिहर काका जिस स्थिति में मिले, उसे देखकर उनके भाइयों का ख़ून खौल उठा। उस वक़्त अगर महन्त, पुजारी या अन्य नौजवान साधु उन्हें नज़र आ जाते तो वे जीते-जी उन्हें नहीं छोड़ते।

हरिहर काका के हाथ और पाँव तो बाँध ही दिए गए थे, उनके मुँह में कपड़ा ठूँसकर बाँध दिया गया था। हरिहर काका ज़मीन पर लुढ़कते हुए दरवाज़े तक आए थे और पैर से दरवाज़े पर धक्का लगाया था।

काका को बन्धनमुक्त किया गया, मुँह से कपड़े निकाले गए। हरिहर काका ने ठाकुरबारी के महन्त, पुजारी और साधुओं की काली करतूतों का परदाफ़ाश करना शुरू किया कि वह साधु नहीं, डाकू, हत्यारे और कसाई हैं, कि उन्हें इस रूप में कमरे में बन्द कर गुप्त दरवाज़े से भाग गए, कि उन्होंने कई सादे और लिखे हुए काग़ज़ों पर जबरन उनके अँगूठे के निशान लिए… आदि।

हरिहर काका ने देर तक अपने बयान दर्ज कराए। उनके शब्द-शब्द से साधुओं के प्रति नफ़रत और घृणा व्यक्त हो रही थी। जीवन में कभी किसी के ख़िलाफ़ उन्होंने इतना नहीं कहा होगा जितना ठाकुरबारी के महन्त, पुजारी और साधुओं के बारे में कहा।

अब हरिहर काका पुनः अपने भाइयों के परिवार के साथ रहने लगे थे। इस बार उन्हें दालान पर नहीं, घर के अन्दर रखा गया था—किसी बहुमूल्य वस्तु की तरह सँजोकर, छिपाकर। उनकी सुरक्षा के लिए रिश्ते-नाते में जितने ‘सूरमा’ थे, सबको बुला लिया गया था। हथियार जुटा लिए गए थे। चौबीसों घण्टे पहरे दिए जाने लगे थे। अगर किसी आवश्यक कार्यवश काका घर से गाँव में निकलते तो चार-पाँच की संख्या में हथियारों से लैस लोग उनके आगे-पीछे चलते रहते। रात में चारों तरफ़ से घेरकर सोते। भाइयों ने ड्यूटी बाँट ली थी। आधे लोग सोते तो आधे लोग जागकर पहरा देते रहते।

इधर ठाकुरबारी का दृश्य भी बदल गया था। एक से एक ख़ूँख़ार लोग ठाकुरबारी में आ गए थे। उन्हें देखकर ही डर लगता था। गाँव के बच्चों ने तो ठाकुरबारी की ओर जाना ही बन्द कर दिया। हरिहर काका को लेकर गाँव प्रारम्भ से ही दो वर्गों में बँट गया था। इस नयी घटना को लेकर दोनों तरफ़ से प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की जाने लगी थीं।

और अब हरिहर काका एक सीधे-सादे और भोले किसान की अपेक्षा चतुर और ज्ञानी हो चले थे। वह महसूस करने लगे थे कि उनके भाई अचानक उनको जो आदर-सम्मान और सुरक्षा प्रदान करने लगे हैं, उसकी वजह उन लोगों के साथ उनका सगे भाई का सम्बन्ध नहीं, बल्कि उनकी जायदाद है, अन्यथा वे उनको पूछते तक नहीं। इसी गाँव में जायदादहीन भाई को कौन पूछता है? हरिहर काका को अब सब नज़र आने लगा था! महन्त की चिकनी-चुपड़ी बातों के भीतर की सच्चाई भी अब वह जान गए थे। ठाकुरजी के नाम पर वह अपना और अपने जैसे साधुओं का पेट पालता है। उसे धर्म और परमार्थ से कोई मतलब नहीं। निजी स्वार्थ के लिए साधु होने और पूजा-पाठ करने का ढोंग रचाया है। साधु के बाने में महन्त, पुजारी और उनके अन्य सहयोगी लोभी-लालची और कुकर्मी हैं। छल, बल, कल, किसी भी तरह धन अर्जित कर बिना परिश्रम किए आराम से रहना चाहते हैं। अपने घृणित इरादों को छिपाने के लिए ठाकुरबारी को इन्होंने माध्यम बनाया है। एक ऐसा माध्यम जिस पर अविश्वास न किया जा सके। इसीलिए हरिहर काका ने मन ही मन तय कर लिया कि अब महन्त को वे अपने पास फटकने तक नहीं देंगे। साथ ही अपनी ज़िन्दगी में अपनी जायदाद भाइयों को भी नहीं लिखेंगे, अन्यथा फिर वह दूध की मक्खी हो जाएँगे। लोग निकालकर फेंक देंगे। कोई उन्हें पूछेगा तक नहीं। बुढ़ापे का दुःख बिताए नहीं बीतेगा!

लेकिन हरिहर काका सोच कुछ और रहे थे और वातावरण कुछ दूसरा ही तैयार हो रहा था। ठाकुरबारी से जिस दिन उन्हें वापस लाया गया था, उसी दिन से उनके भाई और रिश्ते-नाते के लोग समझाने लगे थे कि विधिवत अपनी जायदाद वे अपने भतीजों के नाम लिख दें। वह जब तक ऐसा नहीं करेंगे तब तक महन्त की गिद्ध-दृष्टि उनके ऊपर लगी रहेगी। सिर पर मण्डरा रहे तूफ़ान से मुक्ति पाने के लिए उनके समक्ष अब यही एकमात्र रास्ता है…।

सुबह, दोपहर, शाम, रात गए तक यही चर्चा। लेकिन हरिहर काका साफ़ नकार जाते। कहते—”मेरे बाद तो मेरी जायदाद इस परिवार को स्वतः मिल जाएगी इसीलिए लिखने का कोई अर्थ नहीं। महन्त ने अँगूठे के जो जबरन निशान लिए हैं, उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा हमने किया ही है…।”

भाई जब समझाते-समझाते हार गए तब उन्होंने डाँटना और दबाव देना शुरू किया। लेकिन काका इस रास्ते भी राज़ी नहीं हुए। स्पष्ट कह दिया कि अपनी ज़िन्दगी में वह नहीं लिखेंगे।

बस, एक रात उनके भाइयों ने वही रूप धारण कर लिया, जो रूप महन्त और उनके सहयोगियों ने धारण किया था। हरिहर काका को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उनके वही अपने सगे भाई, जो उनकी सेवा और सुरक्षा में तैयार रहते थे, उन्हें अपना अभिन्न समझते थे, जो उनकी नींद ही सोते और जागते थे, हथियार लेकर उनके सामने खड़े थे। कह रहे थे—”सीधे मन से काग़ज़ों पर जहाँ-जहाँ ज़रूरत है, अँगूठे के निशान बनाते चलो अन्यथा मारकर यहीं घर के अन्दर गाड़ देंगे। गाँव के लोगों को कोई सूचना तक नहीं मिलने पाएगी।”

अगर पहले वाली बात होती तो हरिहर काका डर जाते। अज्ञान की स्थिति में ही मनुष्य मृत्यु से डरते हैं। ज्ञान होने के बाद तो आदमी आवश्यकता पड़ने पर मृत्यु को वरण करने के लिए तैयार हो जाता है। हरिहर काका ने सोच लिया कि ये सब एक ही बार उन्हें मार दें, वह ठीक होगा; लेकिन अपनी ज़मीन लिखकर रमेसर की विधवा की तरह शेष ज़िन्दगी वे घुट-घुटकर मरें, यह ठीक नहीं होगा। रमेसर की विधवा को बहला-फुसलाकर उसके हिस्से की ज़मीन रमेसर के भाइयों ने लिखवा ली। शुरू में तो उसका ख़ूब आदर-मान किया, लेकिन बुढ़ापे में उसे दोनों जून खाना देते उन्हें अखरने लगा। अन्त में तो उसकी वह दुर्गति हुई कि गाँव के लोग देखकर सिहर जाते। हरिहर काका को लगता है कि अगर रमेसर की विधवा ने अपनी ज़मीन नहीं लिखी होती तो अन्त समय तक लोग उसके पाँव पखारते होते।

हरिहर काका ग़ुस्से में खड़े हो गए और गरजते हुए कहा, “मैं अकेला हूँ… तुम सब इतने हो! ठीक है, मुझे मार दो… मैं मर जाऊँगा, लेकिन जीते-जी एक धूर ज़मीन भी तुम्हें नहीं लिखूँगा… तुम सब ठाकुरबारी के महन्त-पुजारी से तनिक भी कम नहीं…!”

“देखते हैं, कैसे नहीं लिखोगे? लिखना तो तुम्हें है ही, चाहे हँस के लिखो या रो के…।”

हरिहर काका के साथ उनके भाइयों की हाथापाई शुरू हो गई। हरिहर काका अब उस घर से निकलकर बाहर गाँव में भाग जाना चाहते थे, लेकिन उनके भाइयों ने उन्हें मज़बूती से पकड़ लिया था। प्रतिकार करने पर अब वे प्रहार भी करने लगे थे। अकेले हरिहर कई लोगों से जूझ सकने में असमर्थ थे, फलस्वरूप उन्होंने अपनी रक्षा के लिए ख़ूब ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। अब भाइयों को चेत आया कि मुँह तो उन्हें पहले ही बन्द कर देना चाहिए था। उन्होंने तत्क्षण उन्हें पटक उनके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। लेकिन ऐसा करने से पहले ही काका की आवाज़ गाँव में पहुँच गई थी। टोला-पड़ोस के लोग दालान में जुटने लगे थे। ठाकुरबारी के पक्षधरों के माध्यम से तत्काल यह ख़बर महन्त जी तक भी चली गई थी। लेकिन वहाँ उपस्थित हरिहर काका के परिवार और रिश्ते-नाते के लोग, गाँव के लोगों को समझा देते कि अपने परिवार का निजी मामला है, इससे दूसरों को क्या मतलब? लेकिन महन्त जी ने वह तत्परता और फुरती दिखायी जो काका के भाइयों ने भी नहीं दिखायी थी। वह पुलिस की जीप के साथ आ धमके।

पुलिस आने के बाद निजी मामले का सवाल ख़त्म हो गया। घर-तलाशी शुरू हुई। फिर हरिहर काका को उससे भी बदतर हालत में बरामद किया गया जिस हालत में ठाकुरबारी से उन्हें बरामद किया गया था।

बन्धनमुक्त होने और पुलिस की सुरक्षा पाने के बाद उन्होंने बताया कि उनके भाइयों ने उनके साथ बहुत ज़ुल्म-अत्याचार किया है, कि जबरन अनेक काग़ज़ों पर उनके अँगूठे के निशान लिए हैं, कि उन्हें ख़ूब मारा-पीटा है, कि उनकी कोई भी दुर्गति बाक़ी नहीं छोड़ी है, कि अगर और थोड़ी देर तक पुलिस नहीं आती तो वह उन्हें जान से मार देते…।

हरिहर काका के पीठ, माथे और पाँवों पर कई जगह ज़ख़्म के निशान उभर आए थे। वह बहुत घबराए हुए-से लग रहे थे। काँप रहे थे। अचानक गिरकर बेहोश हो गए। मुँह पर पानी छींटकर उन्हें होश में लाया गया। भाई और भतीजे तो पुलिस आते ही चम्पत हो गए थे। पुलिस की पकड़ में रिश्ते के दो व्यक्ति आए। रिश्ते के शेष लोग भी फ़रार हो गए थे…।

हरिहर काका के साथ घटी घटनाओं में यह अब तक की सबसे अन्तिम घटना है। इस घटना के बाद काका अपने परिवार से एकदम अलग रहने लगे हैं। उनकी सुरक्षा के लिए राइफ़लधारी पुलिस के चार जवान मिले हैं। हालाँकि इसके लिए उनके भाइयों और महन्त की ओर से काफ़ी प्रयास किए गए हैं। असल में भाइयों को चिन्ता थी कि हरिहर अकेले रहने लगेंगे, तब ठाकुरबारी के महन्त अपने लोगों के साथ आकर पुनः उन्हें ले भागेंगे। और यही चिन्ता महन्त जी को भी थी कि हरिहर को अकेला और असुरक्षित पा उनके भाई पुनः उन्हें धर दबोचेंगे। इसीलिए जब हरिहर काका ने अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस की माँग की तब नेपथ्य में रहकर ही उनके भाइयों और महन्त जी ने पैरवी लगा और पैसे ख़र्च कर उन्हें पूरी सहायता पहुँचायी। यह उनकी सहायता का ही परिणाम है कि एक व्यक्ति की सुरक्षा के लिए गाँव में पुलिस के चार जवान तैनात कर दिए गए हैं।

जहाँ तक मैं समझता हूँ, फ़िलहाल हरिहर काका पुलिस की सुरक्षा में रह ज़रूर रहे हैं, लेकिन वास्तविक सुरक्षा ठाकुरबारी और अपने भाइयों की ओर से ही मिल रही है। ठाकुरबारी के साधु-सन्त और काका के भाई इस बात के प्रति पूरी तरह सतर्क हैं कि उनमें से कोई या गाँव का कोई अन्य हरिहर काका के साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती न करने पाए। साथ ही अपना सद्भाव और मधुर व्यवहार प्रकट कर पुनः उनका ध्यान अपनी ओर खींच लेने के लिए दोनों दल प्रयत्नशील हैं।

गाँव में एक नेता जी हैं, वह न तो कोई नौकरी करते हैं और न खेती-गृहस्थी, फिर भी बारहों महीने मौज उड़ाते रहते हैं। राजनीति की जादुई छड़ी उनके पास है। उनका ध्यान हरिहर काका की ओर जाता है। वह तत्काल गाँव के कुछ विशिष्ट लोगों के साथ उनके पास पहुँचते हैं और यह प्रस्ताव रखते हैं कि उनकी ज़मीन में ‘हरिहर उच्च विद्यालय’ नाम से एक हाई स्कूल खोला जाए। इससे उनका नाम अमर हो जाएगा। उनकी ज़मीन का सही उपयोग होगा और गाँव के विकास के लिए एक स्कूल मिल जाएगा। लेकिन हरिहर काका के ऊपर तो अब कोई भी दूसरा रंग चढ़ने वाला नहीं था। नेता जी भी निराश होकर लौट आते हैं।

इन दिनों गाँव की चर्चाओं के केन्द्र हैं हरिहर काका। आँगन, खेत, खलिहान, अलाव, बग़ीचे, बरगद हर जगह उनकी ही चर्चा। उनकी घटना की तरह विचारणीय और चर्चनीय कोई दूसरी घटना नहीं। गाँव में आए दिन छोटी-बड़ी घटनाएँ घटती रहती हैं, लेकिन काका के प्रसंग के सामने उनका कोई अस्तित्व नहीं। गाँव में जहाँ कहीं और जिन लोगों के बीच हरिहर काका की चर्चा छिड़ती है तो फिर उसका कोई अन्त नहीं। लोग तरह-तरह की सम्भावनाएँ व्यक्त करते हैं—”राम जाने क्या होगा? दोनों ओर के लोगों ने अँगूठे के निशान ले लिए हैं। लेकिन हरिहर ने अपना बयान दर्ज कराया है कि वे दोनों लोगों में से किसी को अपनी ज़मीन का उत्तराधिकारी नहीं मानते हैं। दोनों ओर के लोगों ने जबरन उनके अँगूठे के निशान लिए हैं। इस स्थिति में उनके बाद उनकी जायदाद का हक़दार कौन होगा?”

लोगों के बीच बहस छिड़ जाती है। उत्तराधिकारी के कानून पर जो जितना जानता है, उससे दस गुना अधिक उगल देता है। फिर भी कोई समाधान नहीं निकलता। रहस्य ख़त्म नहीं होता, आशंकाएँ बनी ही रहती हैं। लेकिन लोग आशंकाओं को नज़रअन्दाज़ कर अपनी पक्षधरता शुरू कर देते हैं कि उत्तराधिकार ठाकुरबारी को मिलता तो ठीक रहता। दूसरी ओर के लोग कहते कि हरिहर के भाइयों को मिलता तो ज़्यादा अच्छा रहता।

ठाकुरबारी के साधु-सन्त और काका के भाइयों ने कब क्या कहा, यह ख़बर बिजली की तरह एक ही बार समूचे गाँव में फैल जाती है। ख़बर झूठी है कि सच्ची, इस पर कोई ध्यान नहीं देता। जिसे ख़बर हाथ लगती है, वह नमक-मिर्च मिला उसे चटकाकर आगे बढ़ा देता है।

एक ख़बर आती है कि महन्त जी और हरिहर काका के भाई इस बात के लिए अफ़सोस कर रहे हैं कि अँगूठे के निशान लेने के बाद उन्होंने हरिहर को ख़त्म क्यों नहीं कर दिया। बात ही आगे नहीं बढ़ती।

एक दूसरी ख़बर आती है कि हरिहर मरेंगे तो उन्हें अग्नि प्रदान करने के लिए ठाकुरबारी के साधु-सन्तों और काका के भाइयों के बीच काफ़ी लड़ाई होगी। दोनों ओर से अग्नि प्रदान करने का निश्चय हो चुका है। इस सन्दर्भ में उनकी लाश हस्तगत करने के लिए ख़ून की नदी बहेगी।

एक तीसरी ख़बर आती है कि हरिहर काका की मृत्यु के बाद उनकी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने के लिए उनके भाई अभी से तैयारी कर रहे हैं। इलाक़े के मशहूर डाकू बुटन सिंह से उन लोगों ने बातचीत पक्की कर ली है। हरिहर के पन्द्रह बीघे खेत में से पाँच बीघे बुटन लेगा और दख़ल करा देगा। इससे पहले भी इस तरह के दो-तीन मामले बुटन ने निपटाए हैं। पूरे इलाक़े में उसके नाम की तूती बोलती है।

एक चौथी ख़बर आती है कि महन्त जी ने निर्णय ले लिया है, हरिहर की मृत्यु के बाद देश के कोने-कोने से साधुओं और नागाओं को वह बुलाएँगे।

रहस्यात्मक और भयावनी ख़बरों से गाँव का आकाश आच्छादित हो गया है। दिन-प्रतिदिन आतंक का माहौल गहराता जा रहा है। सबके मन में यह बात है कि हरिहर कोई अमृत पीकर तो आए हैं नहीं। एक न एक दिन उन्हें मरना ही है। फिर एक भयंकर तूफ़ान की चपेट में यह गाँव आ जाएगा। उस वक़्त क्या होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। यह कोई छोटी लड़ाई नहीं, एक बड़ी लड़ाई है। जाने-अनजाने पूरा गाँव इसकी चपेट में आएगा ही…। इसीलिए लोगों के अन्दर भय भी है और प्रतीक्षा भी। एक ऐसी प्रतीक्षा जिसे झुठलाकर भी उसके आगमन को टाला नहीं जा सकता।

और हरिहर काका! वह तो बिलकुल मौन हो अपनी ज़िन्दगी के शेष दिन काट रहे हैं। एक नौकर रख लिया है, वही उन्हें बनाता-खिलाता है। उनके हिस्से की ज़मीन में जितनी फ़सल होती है, उससे अगर वह चाहते तो मौज की ज़िन्दगी बिता सकते थे। लेकिन वह तो गूँगेपन का शिकार हो गए हैं। कोई बात कहो, कुछ पूछो, कोई जवाब नहीं। खुली आँखों से बराबर आकाश को निहारा करते हैं। सारे गाँव के लोग उनके बारे में बहुत कुछ कहते-सुनते हैं, लेकिन उनके पास अब कहने के लिए कोई बात नहीं।

पुलिस के जवान हरिहर काका के ख़र्चे पर ही ख़ूब मौज-मस्ती से रह रहे हैं। जिसका धन वह रहे उपास, खाने वाले करें विलास। अब तक जो नहीं खाया था, दोनों जून उसका भोग लगा रहे हैं।

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