‘Hastakshep Ka Apradhi’, a poem by Shravan

रातों के सन्नाटों में
किसी चमगादड़-सी डराती हुई
एक चीख़ शृंखलाबद्ध रूप से
मेरे कानों में आकर थम जाती है,
सिसकियों से गूँजने लगता है
सारा अन्तर्मन,
काँपने लगता है बदन और खड़े हो जाते रोंगटे सारे,
मेरे पड़ोस का अमूमन
यह एक-सा घटनाक्रम
एक शराबी पति आ-आकर कुछ रुपयों की ख़ातिर
लेता अपनी पत्नी को रिमाण्ड पर कुछ ऐसे ही
जैसे पुलिस उगलवाती है गुनाह
किसी बेगुनाह के मुँह से

मैं करता हूँ हिम्मत हर दिन
कि जाऊँ और पकड़ लूँ हाथ पति का
लेकिन हताश होकर थम जाता हूँ
और सोचता हूँ कि अगर पूछ लिया उसने मुझसे यह
मैं उसका पति
तुम कौन?
क्या उत्तर है मेरे पास इस प्रश्न का?
जो प्रश्न आधारित है
धर्म ग्रंथों की ऋचाओं,
शास्त्रीय सिद्धांतों
और सदियों की सामाजिक परम्पराओं पर

वो उसका पति परमेश्वर
मारे, काटे, जलाए या जुए में हार जाए,
यहाँ उसकी डोली आयी है
और यहीं से उसकी अर्थी निकलेगी
इसी सूत्र के आसपास
वैधता समाप्त हो जाती है अन्य सम्बन्धों की
फिर मेरा तो कोई सम्बन्ध भी नहीं
मैं अधिकारहीन
मैं विवश हूँ
सामाजिक बन्धनों से

फिर भी कर लूँ मैं अगर साहस
हो जाता हूँ अनैतिक
बन जाता हूँ
सामाजिक मापदण्ड के अन्तर्गत
किसी के घरेलू मसले में
हस्तक्षेप का अपराधी।

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