हवाओं की सदाएँ सुन सके तो सुन ज़रा ज़ालिम,
है तुझमें ज़ोर तो आकर के मुझपे आज़मा ज़ालिम।

ये तेरी जुर्रतें मुझको बड़ी बेबस सी लगती हैं,
ख़ुदा के वास्ते इनमे ज़रा सा जोश ला ज़ालिम।

अगर ‘तू’ है हवा तो ख़ुद में भी तूफान लेकर आ,
अगर ‘तू’ आग है तो इक दफ़ा ख़ुद को जला ज़ालिम।

गुलाबों को बिछाना राह में तो बस नुमाइश है,
अगर मुझको है पाना तो कोई किस्सा सुना ज़ालिम।

तिरे लफ़्ज़ों से अच्छी है तिरे होठों की नाराज़ी,
मिरी ये इल्तिजा है की तू मुझसे रूठ जा ज़ालिम।

खरीदा जा नहीं सकता ये सोना कुछ भी कीमत पर,
तू अपनी शान में जा कर कोई पत्थर सजा ज़ालिम।

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