हमने चलती चक्की देखी
हमने सब कुछ पिसते देखा
हमने चूल्हे बुझते देखे
हमने सब कुछ जलते देखा

हमने देखी पीर पराई
हमने देखी फटी बिवाई
हमने सब कुछ रखा ताक़ पर
हमने ली लम्बी जमुहाई

हमने देखीं सूखी आँखें
हमने सब कुछ बहते देखा
कोरे हड्डी के ढाँचों से
हमने तेल निकलते देखा

हमने घोका ज्ञान पुराना
अपने मन का कहना माना
पहले अपनी जेब सम्भाली
फिर दी सारे जग को गाली

हमने अपना फ़र्ज़ निभाया
राष्ट्र-पर्व पर गाना गाया
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
आपस में सब भाई-भाई।

भगवत रावत की कविता 'चिड़ियों को पता नहीं'

Book by Bhagwat Rawat: