Poem: ‘If’ – Rudyard Kipling
अनुवाद: प्रीता अरविन्द

अगर आपके आसपास
लोग ग़लतियाँ कर उसका ठीकरा
आपके सर फोड़ें और आप शांत रहें,
अगर सभी लोग आप पर
संदेह करें फिर भी
आप ख़ुद पर विश्वास बनाए रखें,
अगर आप इंतज़ार कर सकते हों
इंतज़ार करते थकते नहीं हों
अपने बारे में झूठ फैलाए जाते देख भी
झूठ का कारोबार न करते हों,
दूसरे आपसे घृणा करें तो भी
आप घृणा और द्वेष को बढ़ावा न देते हों

अगर आप सपने देखते हों
फिर भी सपनों को जुनून न बनाते हों
अगर आप सोचते हों लेकिन
अपनी सोच किसी भी शर्त पर
दूसरों पर थोपते नहीं हों,
अगर खेलते हों पर
खेल में हार हो या जीत
समान भाव से स्वीकार करते हों,
अगर आप अपने कहे सच को
तोड़ मरोड़ कर पेश किए जाने पर भी
विचलित न होते हों,
अगर आप ज़िन्दगी भर की कमाई को
पल में टूटते बिखरते देख सकते हों
और फिर उसे सँवारने में जुट जाते हों

अगर आप अपना सब कुछ एक बार में
दाँव पर लगाकर खो सकते हों
और बिना उफ़ किए ही फिर से
शुरुआत से शुरू कर सकते हों,
अगर आप अपने दिल दिमाग़
और स्नायु तंत्र को उनके बूढ़े
हो जाने के बाद भी
अपनी इच्छाशक्ति से
कार्यरत रख सकते हों
अगर आप बेक़ाबू भीड़ से बात करते हुए
भी अपना विवेक न खोते हों

बाहुबलियों के संग चलते हुए भी
आम आदमी की अपनी सोच न छोड़ते हों
अगर न आपके जानी दुश्मन
न जिगरी दोस्त ही
आपका कुछ बिगाड़ सकते हों,
अगर हर एक इंसान आपके लिए
बराबर मायने रखता हो लेकिन
कोई भी आप के ऊपर
हावी न हो सकता हो,
अगर आप एक मिनट में
साठ सेकण्ड की
लम्बी रेस दौड़ते हों,
तो फिर ये धरती और
इस धरती के नीचे-ऊपर का
सब कुछ आपका है
और सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि
आप आदमी बन सकते हैं
मेरे दोस्त!

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